छत्तीसगढ़ का एक ऐसा मठ जहां 470 सालों से मिट्टी के चूल्हे पर बन रहा प्रसाद, हर दिन 300 लोगों को मिलता है भोजन
मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच पूरे देश में एलपीजी की किल्लत देखने को मिल रही है. गैस सिलेंडर के लिए लोग लंबी-लंबी लाइनों में लगने को मजबूर हो गए हैं. घरेलू गैस सिलेंडर की बुकिंग के लिए भी 25 दिनों को समय रखा हुआ है. इन सारी दिक्कतों के बीच छत्तीसगढ़ का एक ऐसा मठ है जहां पिछले 470 सालों से लगातार भोग प्रसाद तैयार किया जा रहा है वो भी चूल्हे पर.
300 लोगों को हर दिन मिलता है भोग प्रसाद
राजधानी रायपुर में स्थित दूधाधारी मठ अपनी सदियों पुरानी परंपरा को बचाए हुए है. यहां आज भी मिट्टी के चूल्हों पर भोग प्रसाद तैयार किया जाता है. यहां दो रसोई हैं, दोनों में मिट्टी के चूल्हे में लकड़ी को जलाकर भोजन तैयार किया जाता है. हर दिन 300 से अधिक लोग इस भोजन प्रसाद को खाते हैं.
84 गांवों से आती हैं लकड़ियां
दूधाधारी मठ की स्थापना साल 1554 में हुई थी. उस समय पुजारियों ने जो परंपरा शुरू की थी, वह आज भी जारी है. सीता रसोई में सुबह के समय प्रसाद तैयार किया जाता है. वहीं, अनुसुइया रसोई में शाम के वक्त भोग प्रसाद बनता है. दूधाधारी मठ मंदिर के अधीन 84 गांव हैं. इन्हीं गांवों से आज भी प्रसाद तैयार करने के लिए लकड़ियां आती हैं.
अकाल के समय बना सहारा
बताया जाता है कि साल 1975 में इस क्षेत्र में अकाल पड़ा था. उस समय मठ ने एक महीने तक लोगों के लिए भोजन का प्रबंध किया था. इस मठ की रसोई में पुजारी और महंत भोजन प्रसाद तैयार करते हैं. किसी और को रसोई में जाने की इजाजत नहीं है. मान्यताओं के मुताबिक वनवास के दौरान माता सीता, भगवान राम के साथ यहां ठहरी हुई थीं.
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