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(विचार-मंथन) मानसिक रोगियों के कारनामों से बदनाम होता देश (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान)

(विचार-मंथन) मानसिक रोगियों के कारनामों से बदनाम होता देश (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान)

देश में इस समय जिस तरह से मासूम बच्चियों को हवश का शिकार बनाकर हत्याएं की जा रही हैं, वैसा तो किसी युग में देखने और सुनने को नहीं मिला। हद तो यह है कि निकृष्ठ समझे जाने वाले पशु-पक्षी और कीड़े-मकौड़े भी ऐसा करते कभी देखे नहीं गए हैं। फिर आज के इंसान को ऐसा क्या हो गया है कि जाति, धर्म और धन-दौलत के साथ ही साथ राजनीति के नाम पर जहां संबंधों को तार-तार करके रख दे रहा है तो वहीं दूसरी तरफ मासूमों को अपनी हवस का शिकार बना हत्या जैसा जघन्य अपराध करने से भी पीछे नहीं हट रहा है। हद तो तब हो जाती है जबकि भीड़ इन्हें सही ठहराने और कानून को अपना काम नहीं करने देने के लिए आगे आती हुई दिखाई देती है। ऐसे में क्या यह नहीं मान लेना चाहिए कि हमारे सभ्य और सुसंस्कृत कहे जाने वाले समाज में ईश्वर की सबसे सुंदर और सभ्य कही जाने वाली मानवता पूरी तरह मर चुकी है, जिस कारण आए दिन मासूम बच्चियां इस तरह के दर्दनाक हादसों से गुजर रही हैं। आखिर उन नारों का क्या हुआ जिसे सीना तानकर लगाया जाता है कि ‘बेटी है तो कल है।’ जरा गौर करें कि जिन मासूम बच्चियों के साथ यह सब हो रहा है दरअसल उन्हें तो इसका अर्थ भी नहीं मालूम होता है और न ही ये बच्चियां यही जानती हैं कि वो किस कारण इस नर्क को भोगने के लिए मजबूर की जा रही हैं। अगर यह जाति या धर्म के नाम पर किया जाने वाला कुकृत्य है तो ऐसा करने वालों से पूछना होगा कि आखिर किस धर्म ग्रन्थ में लिखा है कि ऐसा करने से ईश्वर प्रसन्न होता है और मनुष्य को आत्मशांति मिलती है। दरअसल ऐसा किया जाना हैवान होने की निशानी है। अगर गलत नहीं है तो यह निरा मानसिक रोगियों की निशानी भी कही जा सकती है। एक खास तरह के रोगी होने के चलते ही जघन्य अपराध करते हुए व्यक्ति या उनका समूह अंधा और बहरा हो वो सब करता चला जाता है, जिसकी इजाजत दुनिया का कोई धर्म, समाज या कानून नहीं दे सकता है। सालों में कभी अनायास यदि ऐसी कोई घटना कभी घटित हो जाती तो समझा जा सकता था कि इसके पीछे अमुक कारण रहे होंगे, लेकिन यहां तो आए दिन इस तरह की खबरें आ रही हैं कि मासूम बच्चियों का जीना दूभर हो गया है। आखिर कैसे भुलाया जा सकता है कि नौनिहाल, मासूम बच्चे और बच्चियां तो स्वयं ही भगवान को रुप होते हैं, फिर इन फरिश्तों को इस कदर तकलीफ पहुंचाना जायज कैसे ठहराया जा सकता है। मशहूर शायर एवं गीतकार निदा फाजली ने एक मुशायरे के दौरान यह शेर सुनाया, ‘घर से मस्जिद है बड़ी दूर, चलो यूं कर लें किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।’ तब पाकिस्तान के कट्टर कहे जाने वाले मुल्लाओं ने उनसे पूछा था कि ‘क्या आप किसी बच्चे को खुदा से बड़ा मानते हैं?’ बहरहाल जब निदा फाजली ने उनके सवाल के जवाब में यह कहा कि ‘मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि मस्जिद इंसान के हाथ बनाते हैं जबकि बच्चे को खुदा अपने हाथों से बनाता है।’ तो वो भी लाजवाब हो गए थे और कुछ कहने के लायक नहीं बचे थे। इस किस्से को सुनाने वाले निदा फ़ाज़ली अब हमारे बीच नहीं हैं, वर्ना मासूम बच्चियों के साथ होने वाले तकलीफदेह हादसों से वो न सिर्फ आहत होते बल्कि कहने पर मजबूर होते कि बच्चों को रुलाने वालों तुमसे तुम्हारा खुदा कभी भी राजी न हो और जीतेजी तुम दोजख की आग में झोंके जाओ। उन्नाव, कठुवा और अब मध्य प्रदेश की औद्योगिक नगरी इंदौर में एक चार माह की बच्ची के साथ जो हुआ उसने अंदर तक हिला कर रख दिया है। ये घटनाएं लगातार दिल और दिमाग पर चोट कर रही हैं। समझ से परे होता जा रहा है कि समाज को आखिर किस कानून की जरुरत है, जिसके तहत इन अपराधों को वाकई रोक पाने में हम कामयाब हो सकेंगे। बहरहाल मासूम बच्चियों के साथ रेप और हत्या के खिलाफ यूं तो दुनियाभर में आवाज उठ रही है, लेकिन देश की दशा और दिशा तय करने वालों की नींद कब खुलेगी कहना मुश्किल है। एक तरफ ‘जस्टिस फॉर आसिफा’ के नारे आसमान की ऊंचाइयां छूते नजर आते हैं तो दूसरी तरफ राजनीति करने वाले उसी जगह से कुछ इस तरह मुंह आसमान की तरफ उठाकर चलते नजर आ जाते हैं कि मानों यह उनकी अपनी दुनिया है ही नहीं। ऐसे जिम्मेदारों को क्या महाभारत काल के बाद की उस दुनिया की चीत्कार सुनाई नहीं देती जिसमें बचा हुआ अपंग समाज भी सिर्फ और सिर्फ मौत की भीख मांगता नजर आता हैं। वो दृष्य जिसे देखकर भगवान भी सिहर उठे उसे फलीभूत करने वाला वाकई इंसान तो नहीं हो सकता, यदि वो दानव है तो फिर उसका मानव समाज में क्या काम? ऐसे तमाम दानवों और मानसिक रोगियों की पहचान के लिए भी कोई न कोई कानून तो होना ही चाहिए, ताकि उन्हें किसी कारगर मेडिकल जांच से गुजार कर समय पूर्व इलाज किया जा सके। इसके बगैर हमारे समाज को सुंदर से सुंदर बनाने और रहने लायक बनाने वाली ये नन्हीं परियां यूं ही इन दरिंदों की हवस का शिकार होती रहेंगी और इनका कत्लेआम यूं ही जारी रहेगा, क्योंकि जिस भीड़ ने नाबालिग बच्चियों के रेप और हत्या को सही ठहराने की भरसक कोशिश की है वो कहीं न कहीं मानसिक रुप से बीमार ही हैं, जिनका इलाज होना होना ही चाहिए। इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह भी एक तरह से समाजसेवा और देशहित के साथ ही साथ धार्मिक काज भी है।

 

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