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और न्याय व्यवस्था न्याय न दे! तब मैं गंडासा क्यों न उठाऊँ ? बिरसा मुंडा [पुण्यतिथि विशेष]

और न्याय व्यवस्था न्याय न दे! तब मैं गंडासा क्यों न उठाऊँ ? बिरसा मुंडा [पुण्यतिथि विशेष]

“संतोष कुमार कुंजाम”

गंडासा क्यों उठता है ?
और गर्दन क्यों कटती है ?

एक आदिवासी के हाथों,
ऐसी निर्ममता क्यों होती है?
जब अन्याय सहन से बाहर हो
जब दर्द माथे पर उभर आये
और न्याय व्यवस्था न्याय न दे!
तब मैं गंडासा क्यों न उठाऊँ ?
दुराचारी अत्याचारी की ,
गर्दन धड़ से क्यों न उड़ाऊँ ?
गुहार लगाकर थक जाता हूँ
अर्थाभाव के चक्कर में,
खेत पेड़ घरबार बेचकर
अपनी ही ज़मीन से हटाया जाता हूँ
पर भी मुझको न्याय न मिले तो
दुराचारी अत्याचारी की,
गर्दन धड़ से क्यों न उड़ाऊँ
शांत मन से जीना चाहता हूँ
बैर नहीं करना चाहता हूँ!
युद्ध कभी मेरा ध्येय नहीं था
लड़ाई से अक्सर दूर रहा हूँ
फिर भी शांति कोई लुटे मेरा
तब मैं सब्र कहाँ से लाऊँ?
दुराचारी अत्याचारी की
गर्दन धड़ से क्यों न उड़ाऊँ?
घटना की प्राथमिकी दर्ज़ करने
जब भी मैं थाना जाता हूँ
पर्याप्त सबूत और धनाभाव में
अपने ही मोहर से पीट जाता हूँ
और प्रकरण (केस)नहीं बनता उत्तर है,
तब मैं किसकी द्वार खटखटाऊँ ?
दुराचारी अत्याचारी की
गर्दन धड़ से क्यों न उड़ाऊँ !!!

आज 9 जून धरती के आबा बिरसा की शहादत में ये स्वरचित कविता श्रद्धासुमन समर्पित।

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