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गीत बिना मर जाएंगे। पत्तों-सा झर जाएंगे।

गीत बिना मर जाएंगे। पत्तों-सा झर जाएंगे।

“वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पंकज”

इस बार साहित्य का नोबेल पुरस्कार अमरीकी गीतकार और गायक बॉब डिलेन को मिला, यह खबर सकून देने वाली है, इसलिए कि दुनिया में गीत प्रतिष्ठित हुआ है। गीत के प्रति कुछ लोगों की तथाकथित आधुनिक-दृष्ठि अलगाववादी है. छंदमुक्त कविता के दौर में गीत को हाशिये पर डाला गया, जबकि गीत हमारी आत्मा का हिस्सा है. बॉब के अनेक गीत यू ट्यूब में हैं, उनको सुने तो हम पाते है, उनमे करुणा है, उल्लास है. लोकराग है. आधुनिक संस्पर्श भी. गीत जब लोगों के बीच बॉब डिलेन की तरह प्रस्तुत किया जाता है तो वह गीत सबका हो जाता है। बॉब डिलेन पर विस्तार के साथ लेख लिखूँगा।

गीत बिना मर जाएंगे।
पत्तों-सा झर जाएंगे।

गीत हमें ज़िंदा रखते हैं,
घावों को सहलाते हैं।
जब हम होते एकाकी तो –
गीत दौड़ कर आते हैं।
अगर गीत निकले जीवन से,
बाद में हम पछताएंगे।।
गीत बिना मर जाएंगे।

चारों तरफ गीत की दुनिया,
धरती को यह भाता है।
सुनें गौर से गाती नदियाँ,
पर्वत भी दुहराता है।
वृक्ष गुनगुनाते चिड़ियों संग,
हम भी मिलकर गाएँगे।।
गीत बिना मर जाएंगे।

जिसके मन में गीत नहीं है,
उसका कोई मीत नहीं।
हारेगा वह प्रतिपल जीवन,
यह तो कोई रीत नहीं।
बेतुक-छन्दहीन जीवन से,
हम तुक में कब आएँगे।
गीत बिना मर जाएंगे

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