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(विचार-मंथन) यूं डिगने वाला नहीं है दलितों का आत्मविश्वास

(विचार-मंथन) यूं डिगने वाला नहीं है दलितों का आत्मविश्वास

(लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान)
सत्य पर आधारित मानव समाज का आत्मविश्वास मरते दम तक नहीं डिगता है, लेकिन जब उसमें झूठ-फरेब या दिखावा आ जाए तो वह एक छोटी सी ठोकर से भी शीशे की तरह चकनाचूर भी हो जाता है। इसलिए कहते हैं कि वो आत्मविश्वास ही क्या जो कि ठोकरों या चंद घटनाओं से डिग जाए। दरअसल यह सब इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद देशभर में दलितों के नाम पर जो हिंसा हुई, उसके बाद अब एक बार फिर अदालत को बताया जा रहा है कि उसके फैसले से दलितों का आत्मविश्वास डिग गया है और उसका मनोबल टूटा है। इन दलीलों को यूं तो अदालत ने खारिज कर दिया, लेकिन उसके साथ ही सवाल भी खड़े हो गए कि आखिर न्याय के रास्ते पर चलते हुए किसी का मनोबल क्योंकर टूटेगा या उसका न्याय के प्रति आत्मविश्वास कैसे डिग सकता है? दरअसल पूरा मामला एससी/एसटी एक्ट को शिथिल करने से संबंधित है। इस मामले को केंद्रबिंदु में रखकर अब यह बताने की कोशिश हो रही है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी/एसटी एक्ट में बदलाव के बाद दलित संगठनों में काफी गुस्सा देखने को मिला है। भारत बंद के दौरान जगह-जगह हिंसा हुईं, लेकिन यह अधूरा सत्य है सही मायने में तो इस हिंसा के पीछे दलितों की नाराजगी कम और गंदी राजनीति का पुट ज्यादा जिम्मेदार रहा है। इसे लेकर सवाल यही उठ रहे हैं कि देश का अधिकांश दलित वर्ग दबा-कुचला, पीड़ित है और ऐसे में वह हिंसा पर विश्वास कैसे कर सकता है, जबकि हर हिंसक घटनाओं में उसे ही नुक्सान उठाना होता है।

वह तो अपने हक और न्याय की मांग करता हुआ शांति के साथ प्रदर्शन करना और परेशानियों व दु:ख को जिम्मेदारों के सामने रखने का काम करता आया है, लेकिन उसके साथ कथित दंबंगों द्वारा जो ज्यादतियां की गई हैं उसे नजरअंदाज करते हुए हर वक्त राजनीतिक रोटियां सेंकने का काम किया गया है। इसे देखते हुए आरक्षण के खिलाफ आवाज उठाने वालों से सवाल किए जा रहे हैं कि क्या दलितों को समाज में बराबरी का दर्जा मिल गया है, यदि नहीं तो फिर आरक्षण व्यवस्था का विरोध इस कदर देश में क्योंकर शुरु हो गया? क्या दलितों को अपमानित करने और उन्हें दबाने के मामले खत्म प्राय: हो गए हैं जो कि नियमों को शिथिल करने की बातें की जाने लगी हैं। आरक्षण और एससी/एसटी एक्ट को हवा देने के लिए न्यायालय के आदेश को ढाल बनाने का काम आखिर किन लोगों ने किया है? इन सवालों के जवाब राजनीतिक चश्में चढ़ाए लोगों को भले न मिले लेकिन जो न्याय पर विश्वास करता है और इंसानियत को सामने रखकर विचार करता है उसे झूठ और सच साफ-साफ नजर आ रहे हैं। बहरहाल देश में हुई हिंसक घटनाओं का हवाला देते हुए केंद्र ने इस फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान केंद्र ने कोर्ट में कहा कि इस फैसले से एससी/एसटी लोगों के मनोबल और आत्मविश्वास पर विपरीत असर पड़ा है। दलितों के आत्मविश्वास पर चोट पहुंची है। हद यह है कि अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि शीर्ष कोर्ट ने जो फैसला दिया उससे काफी नुकसान हुआ है। इन बयानों को जोड़कर देखा जाए तो हिंसा और नुक्सान के लिए अदालत के फैसले को जिम्मेदार ठहराने का काम बदस्तूर किया गया। हालांकि, कोर्ट अपने फैसले पर अडिग है। इस नजरिये से मतलब यही निकाला जा रहा है कि फैसला सही है और उसे माना जाना चाहिए।

जहां तक हिंसा होने का सवाल है तो इसकी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की है, जिसे बिना किसी पूर्वाग्रह या द्वेषवश कार्रवाई किए बिना उचित कदम उठाए जाने चाहिए। इस मामले में जरुर हमारी सरकारें और पुलिस महकमा असफल प्रतीत होता है। इसलिए कहा जा रहा है कि यदि अदालती फैसले को लेकर राजनीति करने की गुंजाइश नहीं तलाशी जाती तो शायद यह हिंसा भी नहीं होती। जहां तक फैसले का सवाल है तो कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कोर्ट के फैसले से कोई हिंसा नहीं हुई है। फैसले को लोगों ने सही तरीके से समझा ही नहीं और चंद लोगों के बहकावे में आकर हिंसा की गई। इस मामले में तो जस्टिस गोयल का कहना रहा है कि दलित समुदाय के लोगों को कोर्ट भी पूर्ण सुरक्षा देता है। अंतत: केंद्र सरकार हार मानने को तैयार नहीं है और वह यह कहते हुए इस मामले में आगे बढ़ रही है कि मामले को बड़ी बेंच को सौंपा जाना चाहिए। बहरहाल दलितों के आत्मविश्वास की दुहाई देने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि आजादी के इतने सालों बाद भी दलित उत्पीड़न के मामले आम हैं। बावजूद इसके दलित यदि अपने हक की मांग कानून के दायरे में रहकर करता आया है, तो यह उसका न्याय के प्रति अटूट विश्वास ही है। उसे विश्वास है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत वह वो हक हासिल कर ही लेगा, जिसकी कि व्यवस्था भारतीय संविधान उनके लिए करता है। इसलिए दलित समाज आत्मविश्वास से परिपूर्ण है और अगर किसी का विश्वास डग-मग हुआ है तो वह गंदी राजनीति करने वालों का हुआ है, जिसे नजरअंदाज करना एक और हिंसा को दावत देने के बराबर है।

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