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क्या डॉ लोहिया के सपनों को साकार कर रहे हैं नरेन्द्र मोदी…?

क्या डॉ लोहिया के सपनों को साकार कर रहे हैं नरेन्द्र मोदी…?

“आलोक मोहन”

इसी समय में समाजवादी आंदोलन के प्रणेता रहे डॉ राम मनोहर मनोहर लोहिया ने एक नारा दिया था जाति तोड़ो समाज जोड़ो और सौ में पिछड़ा पावे साठ।

इस बात का उल्लेख डॉक्टर लोहिया द्वारा लिखित पुस्तक चौखंबा राज में पढ़ने को मिल जाएगी, कमोबेश अपने समाजवादी आंदोलन को बढ़ाने के लिए डॉ राम मनोहर मनोहर लोहिया ने इस तरह के प्रयास साठ के दशक में व्यवहारिक स्तर पर शुरू कर दिए थे यही वजह रही है कि डॉ राम मनोहर ने 1957 के आम चुनाव में वंचित वर्ग एवं समाज में सबसे निचले पायदान पर रहने वाले , वर्गो जिनका ताल्लुक प्रजा जातियों से रहा है, के लोगों को चुनाव मैदान में उतारा था 1957 में डॉ राम मनोहर के प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने रायबरेली से पंडित जवाहरलाल नेहरू के दामाद श्री फिरोज गांधी के सामने प्रजा जाति से ताल्लुक रखने वाले श्री नंदकिशोर नाई को को चुनाव मैदान में उतारा था जबकि ग्वालियर से रानी विजयाराजे सिंधिया के खिलाफ एक धानुक जाति की संघर्षशील महिला को मैदान में उतारा तत्कालीन समय में डॉक्टर लोहिया ने एक नारा दिया था रानी के खिलाफ एक मेहतरानी और जमाई के खिलाफ एक नाई, कहने का तात्पर्य यह है इस देश में काफी समय से सामाजिक न्याय के नाम पर तमाम तरह के सियासत हो रही है तथा डॉ राम मनोहर लोहिया के समाजवादी आंदोलन को बढ़ाने के नाम पर व्यवहारिक तौर पर कुछ राजनीतिक दलों ने डॉ लोहिया के समाजवाद के बजाय परिवारवाद सामंतवाद व वर्ण व्यवस्था को ही बढ़ावा दिया है। परिणाम स्वरूप यह दल लंबे समय के बाद भी डॉ लोहिया के उस सपने को, जिसमें 100 में 60 पावे पिछड़ा, को साकार नहीं कर पाए हैं इनमें चाहे मुलायम सिंह यादव के समाजवादी पार्टी हो या फिर सामाजिक न्याय के नाम पर राजनीति करने वाले वे तमाम दल, जो पिछड़ों, अति पिछड़ों की बात तो करते हैं लेकिन व्यावहारिक स्तर पर कहीं भी खड़े नजर नहीं आते इससे कांग्रेस के अलावा वामपंथी दल भी अछूते नहीं हैं दुर्भाग्य की बात है जो काम इन दलों को करना चाहिए अब वही काम बनियों व ब्राह्मण की पार्टी कही जाने वाली भारतीय जनता पार्टी एवं उसका वर्तमान नेतृत्व व्यवहारिक स्तर पर अमलीजामा पहना रहा है इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक की भूमिका भी परदे के पीछे अहम हैं भारतीय जनता पार्टी का दो दशक पहले क्या नजरिया रहा है वह अलग पहलू हो सकता है लेकिन सच्चाई यह है की 90 के दशक के बाद आर एस एस एवं भारतीय जनता पार्टी कट्टर हिंदुत्ववादी का चोला उतार कर समावेशी समाज की परिकल्पना को आगे बढ़ाने का काम किया है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ साथ भारतीय जनता पार्टी ने समाजिक समरसता तो मजबूत करके डॉ राम मनोहर लोहिया के व्यवहारिक समाजवाद को को एवं जाति तोड़ो समाज जोड़ो एवं पिछड़े वर्गों को आगे बढ़ाने की उनकी (डॉ लोहिया) मानसिकता की सोच को आगे बढ़ाया है। गत दो दशकों के चुनाव परिणामों एवं भाजपा द्वारा उतारे गए तमाम उम्मीदवारों, चाहे वह विधानसभा के चुनाव हो अथवा लोकसभा के, में उन वंचित समाज के अति पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले लोगों को सर्वाधिक टिकट दिए बल्कि उन्हें चुनाव जितवा करके देश के विधानसभाओं और लोकसभा में लाकर इस वर्ग को मजबूती देने का काम किया है अगर यहां यह कहा जाए वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पूरी पार्टी डॉ राम मनोहर लोहिया के व्यवहारिक समाजवाद को पूरी तौर पर सतह पर लाने का काम कर रही है, तो यह कहना गलत नहीं होगा हकीकत यही है कि नरेंद्र मोदी और उनकी कैबिनेट एवं उनकी पार्टी डॉ राम मनोहर लोहिया के अधूरे सपनों को साकार करने में लगी है उसकी वजह यह है एक दो दशकों में भारतीय जनता पार्टी ने उन तमाम लोगों को टिकट दिया है जो समाज में आज भी अति पिछड़े वर्गों के नाम पर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े नजर आते हैं इनमें वह प्रजाजातियाँ है जो अपने परंपरागत धंधों के साथ ही रोजगार कर रहा है या अपने पुश्तैनी धंधे को आगे बढ़ा रहा है 2014 से लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के बैनर तले जितने भी सांसद व कुछ विधानसभाओं के विधायक चुनाव जीत कर आए हैं उनमें सर्वाधिक संख्या दलित अति पिछड़े वर्ग एवं अनुसूचित जनजाति से ताल्लुक रखने वाले लोग हैं इससे स्पष्ट होता है इसी समय में इस वर्ग के वोटों पर वामपंथी ,कांग्रेसी ,कथित समाजवादीयो का वर्चस्व रहा हो लेकिन इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने इस सामाजिक समीकरण को तोड़ने का काम किया है तथा डॉक्टर लोहिया के असली वारिस होने का दावा ठोका है भले ही समाजवादी अपने आप को सबसे बड़ा लोहिया के वारिस होने का दावा कर रहे हो लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है लोकसभा चुनाव परिणामों में भारतीय जनता पार्टी को 300 सीटों के ऊपर कामयाबी मिलना एवं वर्ग के लोगों को जिता के लाना जो 27% आरक्षण के बावजूद आरक्षण से वंचित रहे हैं वह अपने आप में उन तमाम दलों को भी सोचने की जरूरत है कि आखिरकार भाजपा एवं उसका अग्रज संगठन राष्ट्रीय स्वयं संघ इन वर्ग के लोगों पर सेंध लगाने में कैसे कामयाब रहा, भाजपा के अलावा अन्य पार्टियां अगर परिवारवाद की जकड़ से बाहर निकल कर इन वर्गों के लोगों को टिकट व संगठन में भागीदारी देते तो आज भारतीय जनता पार्टी तीन सौ से ज्यादा सीटें नहीं ला पाती भाजपा ने इन्ही कमियों के फायदा उठाकर पार्टी ने न केवल भागीदारी दी बल्कि सत्ता के शिखर पर भी बैठाने का काम किया।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद एवं प्रधानमंत्री पद पर विराजमान एवं उनकी आधी कैबिनेट को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।भारतीय जनता पार्टी का ये सतत प्रयास अनवरत जारी रहने वाला दिखता है, अब देखना ये होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वास्तव में अपने आप को व अपनी पार्टी को डॉ लोहिया का असली वारिस होने का दावा कर सकते हैं कि नहीं ये तो आने वाला समय ही बतायेगा, लेकिन समाजिक न्याय एवं लोहिया के समाजवाद पर राजनीति करने वाले लोगो के सामने सोंचने के लिए मजबूर कर दिए
【लेखक इंडियन जंग के प्रधान संपादक एवं डॉ लोहिया के 10 वर्ष तक सचिव रहे नंदकिशोर जी
छोटे पुत्र हैं】

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