संत विनोबा की झोली बनाम फकीर नरेन्द्र मोदी का झोला......,

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देश को याद है जब नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि हमारा क्या है? हम तो फकीर आदमी हैं, साहब.. झोला उठाएंगे निकल जाएंगे..., खैर, वह बीते दिनों की बात हुई जबकि मोदी नए-नए प्रधान मंत्री बने थे और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की बनाई हुई ट्रेक पर देष की अर्थव्यवस्था दौड़ रही थी लेकिन आज पांच साल के बाद अर्थ तंत्र संकट में है तो संत विनोबा भावे की यादें ताजा हो गईं उनकी झोली और मोदी के झोले का झोल सामने आ गया है ..., 

युवा पीढ़ी को यह ध्यान रखना होगा कि नेतृत्व कौषल हमारे राष्ट्र का सदैव संपन्न रहा है मोदी के आने के बाद ऐसा कुछ हो गया हो जो कि बीते सालों में न हुआ हो, यह महज भ्रम है मृग तृष्णा है यद्यपि मोदी सिर्फ जुमला है जबकि देष में विभूतियों की कमी कभी नहीं रही ..,

15 अपै्रल 1951 को विनोबा ने भूमि संघर्ष के दौर में अपनी पदयात्रा शुरू की, पहला पड़ाव हैदराबाद रहा वहां की जेलों में जाकर विनाबा भावे चरमपंथी वाम विचारकों से मिले उनके हिंसा ग्रस्त आचरण की वजहों पर चर्चा की जो कि सद्भावना पूर्ण रही ...,

18 अपै्रल 1951 की सुबह विनोबा नालगांेडा जिले के पोचमपल्ली गांव में पहुंचे, यह कम्युनिष्ट चरम पंथियों का गढ़ माना जाता था, गांव में चार खून हो चुके थे, आसपास के गांवों को मिलाकर दो साल के भीतर इस इलाके में तब ’’भूमिहीन और भूपतियों के संघर्ष में 22 हत्याएं हो चुकी थी ...,’’ यह नक्सलवाद का दौर नहीं था पर, हिंसा का स्वरूप ठीक वैसा ही था जैसा नक्सल आंदोलन का होता है तब जमींदार निषाने पर होते थे अब पुलिस और फॉरेस्ट अमला निषाने पर होता है..., 

उस दौर में विनोबा भावे भूमिहीन प्रजा के लिए अपनी झोली फैलाकर पदयात्रा पर निकल पड़े 27 जून 1951 को 70 दिनों की पदयात्रा करते हुए वे पवनार अपने आश्रम पहुंचे तो इन दिनों में उनकी झोली में कुल बारह हजार एकड़ जमींन दान मेें आ चुकी थी..., 

इसके बाद वे करीब दो दषक तक निरंतर चलते रहे ’’कष्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और असम से लेकर गुजरात तक इस दौरान उन्हें कुल 42 लाख एकड़ जमीने दान में मिली जो भूमिहिनों में बांट दी गई... उस दौर के प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार लुई फिषर ने कहा था... ’’ग्रामदान पूरब की ओर से आने वाले सबसे अधिक रचनात्मक विचार हैं...,

विनोबा के नेतृत्व में जनास्था का सैलाब उमड़ पड़ता था वह उनकी झोली में समा जाया करता था एक अवसर पर मंगरू राम नामक एक फटेहाल मजदूर उनके पास आया और अपनी आधा एकड़ जमीन में से पांच कटठा जमीन दान में देने की जिद करने लगा बिहार/झारखंड में छोटी-छोटी जमीनों का माप कटठा में होता है वह कहीं एक कटठा का माप 1600 वर्गफीट तो कहीं कम ज्यादा होता है इसी तरह एक नेत्रहीन रामचरण रात के ग्यारह बजे विनोबा के षिविर में पहुंचे और अपने जमीन का दानपत्र उन्हें सौंप गए ....,

संत विनोबा की झोली देश की जनता ने तब भर दी थी जबकि फकीर नरेंद्र मोदी के पांव पालने में थे अब, न तो विनोबा हैं न वो वक्त है पर, मोदी हैं उनकी फकीरी है और उनका झोला है देश इन दिनों गंभीर अर्थ संकट से गुजर रहा है बेकारी, गरीबी आर्थिक मंदी इस सबसे उबरना हो तो नरेंद्र मोदी को विनोबा बनना होगा देश  में भूदान आंदोलन का पार्ट-2 खड़ा करना होगा अपने पांव पर सतत चलना होगा जनता के सामने फकीर का झोला फैलाना होगा फिर देखेंगे कि संत विनोबा की झोली में कमाल था या फकीर नरेंद्र मोदी के झोले में जादू है...,

जनता तब भी वही थी, अब भी वही है सिर्फ कसौटी पर नरेंद्र मोदी हैं जो इतिहास रचनें निकले हैं उन्हें कसा जाना है ....,

 

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