गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ और आदिवासी पहचान की पहल..,

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"नितिन राजीव सिन्हा"

भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ को एक नई पहचान दी है उन्होंने गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ का नारा दिया है इस नारे को पूर्ववर्ती रमन सरकार के विश्वसनीय छत्तीसगढ़ के नारे की तुलना में देखा और समझा जाये तो पाएँगे कि रमन सरकार के प्राथमिकताओं के निहितार्थ पूँजीवाद का रोपण था जल,जंगल और ज़मीन की लूट था लेकिन भूपेश सरकार के नारे में छत्तीसगढ़ की अस्मिता को स्थापित करने की दिशा में होने वाले सार्थक पहल हैं..,


आदिवासी दिवस पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा ने संकेत दे दिया है कि जल,ज़मीन और जंगल की सुरक्षा करने को अपनी परंपरा मानने वाले समाज की भावनाओं की क़द्र भूपेश सरकार कर रही है वह उसे उनकी अधिग्रहीत की हुई ज़मीन टाटा कंपनी से लोहनडीगुडा में वापस दिला रही है आगे भी अनावश्यक औद्योगिकरण को दरकिनार कर आगे बढ़ने की नीतियों पर चलने की मंशा इस सरकार की दिखाई पड़ती है..,


आदिवासी समाज की चिंता धरती को बचाने की चिंता है और आज ग्लोबल वॉर्मिंग के भयावाह दौर में हमें उनकी चिंता को तरजीह देकर आगे बढ़ना होगा तो ही इसके दूरगामी परिणाम फलदाई हो सकते हैं..,आदिवासी समाज के समग्र चिंतन पर लिखना होगा कि-


जंगल,पर
क़हर बरपा
था कि वो
शहर बनते
गये..,नदियाँ
गंदा नाला बन
गईं..,परिंदे
जिनसे बतिया
लेते थे कभी
बस्तर की मैना
के बोल सुन
लेते थे कभी
वो,सुर कहीं
खो गये हैं
विकास की
अंधी दौड़ में
घोंसले उनके
उजड़ गये हैं..,

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