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पत्रकारिता के दार्शनिक आयाम का आधार है ‘आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन’

पत्रकारिता के दार्शनिक आयाम का आधार है ‘आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन’

– लोकेन्द्र सिंह
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के मालवीय पत्रकारिता संस्थान के निदेशक प्रोण् ओम प्रकाश सिंह ने देवर्षि नारद को शोध का विषय बनाकर संचार के भारतीय दर्शन को सामने लाने का उल्लेखनीय कार्य किया है। देवर्षि नारद पर गहन अध्ययन के बाद संचार के भारतीय पक्ष पुस्तक ‘आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन’ के रूप में हमारे सामने आया है। यह पुस्तक निश्चित तौर पर भारतीय पत्रकारिता को एक दिशा देने का कार्य कर सकती है।
देवर्षि नारद का संचार दर्शन भारतीय पत्रकारिता को लोक कल्याण की राह दिखा सकता है। इस संबंध में लेखक प्रोण् ओम प्रकाश सिंह उचित ही कहते हैं. ‘संचार और पत्रकारिता में प्रयोग है, उपयोग है, सिद्धांत है परन्तु दर्शन नहीं है। दर्शन के अभाव में संचार और पत्रकारिता की वर्तमान यात्रा जारी है। हमें वर्तमान में संचार एवं पत्रकारिता के दार्शनिक आयाम को तलाशना है, जिसमें ‘आदि पत्रकार नारद का संचार दर्शन’ एक आधार होगी। संचार एवं पत्रकारिता में भी दार्शनिक विकास के लिए यह जरूरी है कि संचार एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रारंभिक चिंतन एवं चिन्तक की खोज हो। इसी प्रक्रिया में भारत में जन.जन के परिचित सूचक अथवा संचारक देवर्षि नारद को मैंने अपने अध्ययन का आधार बनाया।”
देवर्षि नारद की संचार प्रक्रिया और सिद्धांतों का लेखक ने गहराई से अध्ययन किया है। अध्ययन की गहराई पुस्तक विभिन्न अध्यायों में स्पष्टतौर पर दिखाई पड़ती है। पुस्तक में पाँच अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में देवर्षि नारद के जन्म की कथा को विस्तार से बताया गया है। साथ ही इस बात को स्थापित किया गया है कि नारद प्रत्येक युग में उपस्थित रहे हैं और प्रत्येक युग में उन्होंने संचार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वहन लोक कल्याण की भावना के साथ किया है। द्वितीय अध्याय में लेखक ने प्रमाण के साथ यह बताया है कि नारद को हठपूर्वक ‘आदि पत्रकार’ या ‘आदि संचारक’ नहीं कहा जा रहा है, बल्कि प्राचीन ग्रंथों में भी उनको संचारक के रूप में देखा गया है। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में नारद के लिए श्पिशुन’ शब्द का उपयोग किया गया है। पिशुन का अर्थ होता है. सूचना देने वाला, संकेत करने वाला, भेद बताने वाला, संचारक इत्यादि। इसके साथ ही लेखक ने इसी अध्याय में आदि संचारक नारद की रचनाओं का भी उल्लेख किया है, जिनमें संचार के सिद्धांत स्पष्टतरू दिखाई देते हैं। तृतीय अध्याय में लेखक ने आदि पत्रकार नारद के संचार धर्म की व्याख्या की है। उन्होंने अनेक प्रसंगों के माध्यम से यह स्थापित किया है कि नारद के संचार का धर्म श्लोकहित’ ही था। इन प्रसंगों के माध्यम से पत्रकार के गुणों एवं कर्तव्यों को भी बताने का प्रयास किया गया है। चतुर्थ अध्याय ‘आदि पत्रकार नारद का आध्यात्मिक संचार’ में पत्रकारिता के विविध पहलुओं की प्रसंग सहित व्याख्या की गई है। इनमें आध्यात्मिक संचार, धार्मिक रिपोर्टिंग, सांस्कृतिक पत्रकारिता, साहित्यिक पत्रकारिता, अनुसंधान, पर्यावरण, कृषि पत्रकारिता सहित प्रश्नोत्तरी, साक्षात्कार, तीर्थ वर्णन, पर्यटन, यात्रा वृत्तांत पत्रकारिता शामिल हैं। इसी प्रकार अंतिम अध्याय में संचार के विविध रूपों का वर्णन आया है। निश्चित ही लेखक की यह कृति नारद के विराट स्वरूप और उनके संचार के विस्तृत संसार को प्रकट करती है। यह पुस्तक पत्रकारिता एवं संचार के क्षेत्र की महत्वपूर्ण पुस्तक सिद्ध होगी। संचार के क्षेत्र से जुड़े सभी विद्वानों को यह पुस्तक पढऩी चाहिए और संचार को भारतीय दृष्टिकोण से न केवल देखना प्रारंभ करना चाहिए, बल्कि इस दिशा में और अधिक शोध कार्य करने चाहिए। अर्चना प्रकाशन, भोपाल ने इस महत्वपूर्ण पुस्तक का प्रकाशन किया है।

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