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(विचार-मंथन) कैसे हो कावेरी जल बंटवारा हल, जबकि केंद्र सरकार है चुनाव में व्यस्त (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान)

(विचार-मंथन) कैसे हो कावेरी जल बंटवारा हल, जबकि केंद्र सरकार है चुनाव में व्यस्त (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान)

कावेरी जल बंटवारे को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर काफी हंगामा हो चुका है, ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा जल बंटवारे का मसौदा तैयार करने में की जा रही लेतलाली संकट बढ़ाने जैसी प्रतीत हो रही है। दरअसल केंद्र सरकार ने कावेरी जल बंटवारे के अदालती फैसले को लागू करने वाली योजना तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से और समय मांगा है। केंद्र की ओर से इसका कारण बताते हुए देश की सर्वोच्च अदालत में कहा गया है कि योजना का मसौदा तैयार करने के लिए उसे और वक्त चाहिए क्योंकि प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट मंत्री सभी कर्नाटक चुनाव में व्यस्त हैं। इस पर भी राजनीतिक तौर पर सवाल उठ रहे हैं और कहा जा रहा है कि किसी राज्य के विधानसभा चुनाव हो रहे हैं तो चुनाव आयोग की व्यस्तता और राजनीतिक पार्टियों या फिर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की व्यस्तता तो समझ में आती है, लेकिन केंद्र सरकार और उसके मंत्रियों का चुनाव में व्यस्त होना समझ से परे है। गौरतलब है कि चुनाव तो सियासी पार्टियां ही जीतती हैं, लेकिन सरकार बनने के बाद वो किसी एक दल की सरकार के तौर पर कभी काम नहीं करती हैं, बल्कि उनका ध्येय संपूर्ण देश और देशवासी होते हैं। ऐसे में जबकि सुप्रीम कोर्ट के सामने यह कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार और उसके मंत्री कर्नाटक चुनाव में व्यस्त हैं तो सवाल उठना लाजमी हो जाता है।

 

नियमानुसार तो चुनाव में सरकारी मिशनरी का दुरुपयोग भी नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन यहां तो सीधे-सीधे सरकारें चुनाव लड़ रही हैं और इसके सुबूत भी खूब दिए जा रहे हैं। अब ऐसा करते हुए यह तो कतई नहीं हो सकता कि सरकारी मिशनरी का दुरुपयोग ही नहीं हो रहा हो। इस बात को लेकर विरोधी सरकार को घेर सकते हैं, लेकिन ऐसा होगा नहीं क्योंकि जिनके घर शीशे के होते हैं वो दूसरों के घरों में पत्थर नहीं मारा करते हैं। जहां तक कावेरी जल बंटवारे के फैसले को लागू करने की बात है तो सुप्रीम कोर्ट पहले ही केंद्र सरकार को फटकार लगा चुका है, लेकिन अदालत की अनदेखी कहें या फिर संकट के प्रति लापरवाही कि केंद्र सरकार आज तक कोई मसौदा पेश करना तो दूर तैयार भी नहीं कर पाई है। अब वह करे भी क्या, क्योंकि उसका पूरा कार्यकाल तो चुनाव निपटाने में ही गुजरा जा रहा है। हद तो यह है कि यहां कर्नाटक से वो फुरसत पाएंगे तो फिर राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव सामने आ खड़े होंगे। ये चुनाव तो सरकार को समय ही नहीं दे पाएंगे कि वो जल संकट का समाधान भी निकाल सकें। गौरतलब है कि कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसले के अनुसार मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है और अब तक तो वो ऐसा करने में सफल नहीं हो सकी है। अत: शीर्ष अदालत स्वत: संज्ञान लेते हुए इस लेट-लतीफी को अदालती अवमानना मान ले तो क्या सरकार मुसीबत में नहीं आ जाएगी? वैसे भी कावेरी जल बंटवारा काफी संवेदनशील मामला है। तमिलनाडु ने भी इस मामले को गंभीरता से नहीं लेने का केंद्र पर आरोप लगाया है। यही नहीं बल्कि तमिलनाडु राज्य की ओर से जो बयान आया है उसमें उन्होंने केंद्र को आड़े हाथों लेते हुए संघवाद की हत्या करने वाला और पक्षपातीय कार्यवाही करने वाला निरुपित करने का काम किया है।

 

मामले की गंभीरता इसी बात से भांपी जा सकती है कि केंद्र पर जोर नहीं चलने की स्थिति में अदालत ने एक बार फिर कर्नाटक सरकार को चेताने का काम किया है और कहा है कि यदि कर्नाटक ने आदेश का पालन नहीं किया तो परिणाम भुगतना पड़ेगा। अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार से तमिलनाडु को पानी देने के लिए कह दिया है, जबकि केंद्र सरकार को इस मामले में हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दे दिए हैं। अब जबकि अगली सुनवाई 8 मई को होनी है तो समझा जा रहा है कि जल बंटवारे को लेकर सियासत और तेज हो जाएगी और वो इसलिए क्योंकि कर्नाटक विधानसभा चुनाव जो नाकों चने चबबाए दे रहे हैं। गौर करें कि यदि चुनाव पूर्व पानी दे दिया गया तो कर्नाटक की जनता जिसे पीने का पानी भी बमुश्किल मुहैया हो पा रहा है वह नाराज होगी ही होगी और यदि तमिलनाडु के किसानों को सिंचाई के लिए जल नहीं छोड़ा गया तो यहां हंगामा होने के चांस बढ़ जाएंगे। मतलब मामला सांप और छछूंदर के जैसे हो गया है, जो कि न तो लीलते बन रहा है और न ही उगलते। उस पर शीर्ष अदालत है कि लगातार फटकार पर फटकार लगाए जा रही है, लेकिन जब बात चुनाव में जीत हासिल करने की हो तो किसी की कौन सुनता है। इसलिए कहा जा रहा है कि ऐसे-कैसे कावेरी जल बंटवारा हो सकता है जबकि केंद्र व राज्य सरकार चुनाव में व्यस्त हैं!

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