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प्रजातंत्र के तीनों स्तंभों को अपने कब्जे में रखने को आतुर सरकार..!

प्रजातंत्र के तीनों स्तंभों को अपने कब्जे में रखने को आतुर सरकार..!

(लेखक- ओमप्रकाश मेहता)/ईएमएस)
अब धीरे-धीरे यह रहस्य उजागर होने लगा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बीच जिम्मेदारियों का जो बंटवारा हुआ है, उसके तहत अमित भाई शाह ने पूरे देश पर ‘‘चक्रवर्ती राजा’’ की तरह अपनी सरकारें स्थापित करने की जिम्मेदारी ली है, वहीं नरेन्द्र भाई मोदी ने प्रजातंत्र के तीनों स्तंभों पर सरकार का कब्जा करने का अहम् दायित्व स्वीकार किया है, प्रजातंत्र के तीन स्तंभों में से कार्यपालिका तो स्वयं सरकार होती है, विधायिका (संसद) पर भाजपा का कब्जा है ही और जिन विधानसभाओं पर कब्जा नहीं है, उसके प्रयास किये जा रहे है, और बची न्यायपालिका उस पर येन-केन-प्रकारेण अनाधिकृत कब्जे की कोशिशें शुरू कर दी गई है। अब प्रधानमंत्री का यही प्रयास है कि उनकी समान विचारधारा के लोग न्यायाधीश पदों पर पहुंच जाए और न्यायपालिका पर कब्जा कर लें, इसीलिए प्रधानमंत्री ने चार साल पहले जहां सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के चयन हेतु वर्षों से चली आ रही कालेजियम पद्धति का विरोध किया था, वहीं हाल ही में काॅलेजियम द्वारा चयनित उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के.एम. जोसेफ की नियुक्ति को रद्द कर दिया। न्यायाधीश जोसेफ वे ही न्यायाधीश है जिन्होंने उत्तराखण्ड में राष्ट्रपति शासन लागू करने को अवैध करार दिया था। और अब कालेजियम जस्टिस जोसेफ का पुनः चयन कर उन्हें उच्चत्तम न्यायालय के न्यायाधीश के पद पर नियुक्ति देने जा रहा है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि दिल्ली की वरिष्ठ अधिवक्ता इन्दु मल्होत्रा को सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त करने का फैसला भी कालेजियम का ही था, दोनों ही पदों पर इन्दु जी और जोसेफ का चयन एक साथ किया गया था, जिसमें से जोसेफ के चयन को सरकार ने निरस्त कर दिया।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि न्यायपालिका पर सरकार द्वारा कब्जे का प्रयास कोई नया नहीं है, देश के उच्च न्यायालयों व उच्चत्तम न्यायालयों में लम्बे समय से न्यायाधीशों के सात सौ से अधिक पद रिक्त है और इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एक समारोह में प्रधानमंत्री के सामने आंसू भी बहा चुके है, किंतु सरकार ने पिछले तीन सालों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों की पूर्ति का कोई प्रयास नहीं किया और अब अपनी समान विचारधारा वाले न्यायाधीशों की खोज की जा रही है, जिससे कि न्यायपालिका भी आगे-पीछे सरकार के कब्जे में आ जाए।
यद्यपि यह भी सही है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी पिछले दो-तीन सालों में कई बार सरकार के खिलाफ काफी तीखी टिप्पणियाँ की है, इसी कारण वित्तमंत्री अरूण जेटली को संसद में यहां तक कहना पड़ा था कि ‘‘अब तो देश की सरकार भी सुप्रीम कोर्ट ही चलाएगा और हमारा काम सिर्फ बजट तैयार करना ही रह जाएगा’’। इस प्रकार कुल मिलाकर न्यायपालिका व सरकार के रिश्तों में तल्खी बढ़ती ही जा ही है। कभी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश सीधे मुख्य न्यायाधिपति के खिलाफ प्रेस से बात करते है तो कभी दलित वोट बैंक को बचाने के लिए प्रधानमंत्री जी को कोर्ट के फैसले के खिलाफ अध्यादेश लाना पड़ता है, अर्थात न्यायपालिका की नजर सरकार व उसके फैसलों पर है तो सरकार की नजर न्यायालय के टेढ़ी होती नजरों पर। अब ऐसे में आखिर बरसों से करोड़ों की संख्या में लम्बित न्यायालयीन प्रकरणों का निराकरण हो तो कैसे? फिर यहां यह भी उल्लेखनीय है कि देश की आज जनता की आशा की एक मात्र केन्द्र न्यायपालिका ही रह गई है, क्योंकि आम जनता का राजनेता और उनकी सरकारों पर भरोसा नहीं रहा, इस प्रकार कार्य पालिका व विधायिका जनता का विश्वास खो चुकी है, और न्यायपालिका की ओर ही वह आशा भरी नजरों से निहार रही है ऐसे में यदि न्यायपालिका ने भी जनविश्वास खो दिया तो फिर देश की आमजनता का ‘विश्वास केन्द्र’ कौन सा रह जाएगा? क्योंकि देश के सभी सर्वोच्च पदों पर संघ व भाजपा के विचारों ने कब्जा पहले ही कर लिया है और ये अपने संवैधानिक दायित्व को भूल कर अपने आकाओं के प्रचार में जुट गए है, जैसा कि अभी-अभी मध्यप्रदेश की राज्यपाल ने किया।
इसलिए कुल मिलाकर देश को अब एक ऐसे अंधेरे मोड़ पर ले जाकर खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें उसके सामने गहरी खाई में गिरने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

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