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(मई दिवस पर विशेष) वर्तमान परिवेश में मजदूर मजबूर होता जा रहा है!(लेखक-डॉ. भरत मिश्र प्राची)

(मई दिवस पर विशेष) वर्तमान परिवेश में मजदूर मजबूर होता जा रहा है!(लेखक-डॉ. भरत मिश्र प्राची)

विश्व में आये भूमंडलीयकरण एवं नई आर्थिक नीतियों की दौर में सबसे ज्यादा मार मजदूर वर्ग पर ही पड़ा जहां उसे रोजगार देने वाले मुख्य संसाधन उद्योग बंद होते गये। निजीकरण का एक नया दौर शुरू हुआ जहां निजीकरण की प्रक्रिया को तेजी से बल मिला। देश में चल रहे सार्वजनिक, सरकारी प्रतिष्ठानों पर इस परिवेश के तहत गाज गिरी, तथा इस क्शेत्र से जुड़े करोड़ों श्रमिकों का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया। जिससे करोड़ों घरों के चूल्हों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। साथ ही देश में बेरोजगारी एवं अव्यवस्था का दौर तेजी से चल पड़ा है। इस व्यवस्था में भ्रष्टाचार को एक नया रूप भी विकसित हुआ है जिसके तहत देश की अचल संपत्ति को, जिस पर यहां की जनता का सामूहिक अधिकार बनता है, एक-एक कर स्वहित में निजी हाथों में सौंपे जाने की प्रक्रिया का शुभारंभ भाजपा नेतृत्व में गठित एन.डी.ए. सरकार के कार्यकाल में हो गया। जहां बाल्को, हिन्दुस्तान जिंक जैसे लाभांश में चल रहे उद्योगों को विनिवेश प्रक्रिया के तहत कौड़ियों के भाव निजी हाथों में सौंप दिया गया तथा भारत पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल, भेल जैसे नौरत्नों में आने वाले उद्योगों को भी निजी हाथों में सौंपे जाने का प्रारूप तैयार किया जाने लगा। इस प्रक्रिया का देश के हर भाग में विरोध हुआ।

सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्शेप से तत्काल इस तरह की प्रक्रिया पर अंकुश भी लगा । पर नई आर्थिक नीतियों के तहत उपजी विनिवेश प्रक्रिया में पनपे निजीकरण के दौर ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के नाम देश के लाखों लोगों को बेरोजगार बना दिया। इस प्रक्रिया के तहत उद्योगों में रिक्त स्थानों की पूर्ति नई भर्ती के द्वारा न कर ठेकेदारों के माध्यम से की जाने लगी, जहां निजीकरण का एक नया अव्यवस्थित स्वरूप सामने उभरता साफ-साफ दिखाई देने लगा । जिसके कारण निजीकरण के बढ़ते चरण को रोक पाना मुश्किल हो गया। निजीकरण व विनिवेश के विरोधी स्वर के चलते पूंजीपति समर्थक नई आर्थिक नीतियों की पक्शधर सरकार ने ठेकादारी पद्धति के माध्यम से निजीकरण व विनिवेश के पग पसारने का एक नया मार्ग ढूंढ लिया है। जिसके विकराल स्वरूप को वर्तमान में सार्वजनिक क्शेत्रों के उद्योगों एवं सरकारी संस्थानों में साफ-साफ देखा जा सकता है। इस तरह के बदले स्वरूप में निजीकरण का लक्श्य भी पूरा होता दिखाई दे रहा है तथा लूट का बाजार भी चालू है जहां दोहरे लाभ की तस्वीर साफ-साफ उभरती नजर आ रही है। ठेकेदारी प्रथा के चंगुल में पनपता निजीकरण का यह छद्म स्वरूप निजीकरण से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है जहां मजदूर मजबूर हो चला है। जहां अस्थिरता एवं असंतोष से भरा भविष्य पहले से ही परिलक्शित हो रहा है। रोजगार तो मिल नहीं रहा है जो मिल भी रहा है उसकी सामाजिक सुरक्शा की जिम्मेवारी किसी के पास नहीं । नोटबंदी के दौरान कई जगह कार्यरत मजदूर बेरोजगार हो गये। इस तरह के हालात पर इनकी सुरक्षा के लिये श्रमिक संगठन कोई मदद भी नहीं कर सके। भूमंडलीयकरण एवं नई आर्थिक नीतियों का प्रभाव मजदूर संगठनों पर भी पड़ा जहां वे भी मजदूरों की रक्शा करने में मजबूर रहे । इस तरह के उभरते हालात के लिये श्रमिक संगठन भी कहीं न कहीं जिम्मेवार है जिनकी दोहरी भूमिका सही मायने में अपनी जिम्मेवारी निभाने में असफल रही है। ऐसे माहैल में न तो श्रम का कोई मूल्यांकन रहा, न श्रम से जुड़े लोगों की कोई सुरक्शा।

श्रम, श्रमिक, श्रमिक संगठन एक दूसरे के पूरक है। श्रमिक श्रम करता है और उसके हक दिलाने , हित की रक्शा करने एवं सामाजिक सुरक्शा बहाल करने के दायित्व का भार अपने कंधों पर लेने का संकल्प श्रमिक संगठन लेता है। इसके लिये जरूरत पड़ने पर धरना, घेराव, प्रर्दशन, अनशन, हड़ताल आदि का सहारा लेकर श्रमिक विरोधी व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करता है। श्रमिक दिवस श्रमिकों का राष्ट्रीय त्योहार है जिस दिन दुनियां के श्रमिक संगठन जगह – जगह समारोह आयोजित कर श्रमिकों के मौलिक चेतना को जगाने एवं मालिक वर्ग को बताने का प्रयास करते है कि श्रमिक वर्ग के साथ किसी भी तरह के अनुचित व्यवहार एवं क्रियाकलाप किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किये जायेंगे। इस तरह के उदेश्य को लेकर यहां के सभी श्रमिक संगठन अपने – अपने तरीके से अलग – अलग खेमें में कार्य कर रहे है जिसके वजह से आज मेहनतकश वर्ग सबसे ज्यादा असुरक्शित हो चला है। जहां वह सबसे ज्यादा मजबूर दिखाई दे रहा है।

देश में श्रमिक हित हेतु गठित मुख्यत: अखिल भारतीय स्तर के जो श्रमिक संगठन हैं, उनके रंग – ढंग अलग-अलग है। जिनमें प्रमुख हैं भाकपा की नीतियों से जुड़ी अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक), माकपा से जुड़ी सेन्टर ऑफ ट्रेड यूनियन (सीटू), कांग्रेस की छत्रछाया में भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा के विचारधारा से जुड़ी भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) है। इनके अलावा इन्हीं के बीच से स्वार्थ वशीभूत होकर आपसी मतभेद के कारण उभरे अनेक श्रमिक संगठन भी हैं जिनमें हिन्दुस्तान मजदूर पंचायत, हिन्दुस्तान मजदूर सभा, किसान ट्रेड यूनियन आदि। जिनपर भी किसी न किसी राजनीतिक दलों की छाया विराजमान है। श्रमिकों के हित का संकल्प लेने वाले ये श्रमिक संगठन देश के मजदूरों को कभी भी एक मंच पर होने नहीं देते। जिससे आज मजदूर सबसे ज्यादा मजबूर हो चला है। सरकारें बदल तो रही है पर भूमंडलीयकरण एवं नई आर्थिक नीतियों की दौर में फंसे मजदूरों को कोई बाहर नहीं निकाल पा रहा है जिससे आने वाला समय मजदूर वर्ग के लिये और ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। वर्तमान परिवेश में हर विकास की कड़ी से जुड़ा मजदूर सबसे ज्यादा मजबूर दिखाई देने लगा है।
-ईएमएस/सोनी/30अप्रैल18

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