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प्यार, श्रद्धा और समर्पण का यह भाव: पति की दीर्घायु हेतु वट वृक्ष की पूजा-वट सावित्री व्रत

प्यार, श्रद्धा और समर्पण का यह भाव: पति की दीर्घायु हेतु वट वृक्ष की पूजा-वट सावित्री व्रत

“संजय गुप्ता की रिपोर्ट”

छत्तीसगढ़ में आज के दिन सुहागिनें 16 श्रृंगार करके बरगद के पेड़ की पूजा कर फेरें लगाती हैं ताकि उनके पति दीर्घायु हों । प्यार, श्रद्धा और समर्पण का यह भाव इस देश में सच्चे और पवित्र प्रेम की कहानी कहता है।

वट वृक्ष बरगद को जल चढ़ाना केवल एक प्रथा नहीं बल्कि सुख शांति तरक्की का माध्यम है…
आपको बता दें कि ऐसी मान्यता है कि इसी दिन देवी सावित्री ने यमराज के फंदे से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी। सनातन परंपरा में वट सावित्री पूजा स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे करने से हमेशा अखंड सौभाग्यवती रहने का आशीष प्राप्त होता है।

कथाओं में उल्लेख है कि जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तब सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने सावित्री को ऐसा करने से रोकने के लिए तीन वरदान दिये। एक वरदान में सावित्री ने मांगा कि वह सौ पुत्रों की माता बने। यमराज ने ऐसा ही होगा कह दिया। इसके बाद सावित्री ने यमराज से कहा कि मैं पतिव्रता स्त्री हूं और बिना पति के संतान कैसे संभव है।
सावित्री की बात सुनकर यमराज को अपनी भूल समझ में आ गयी कि,वह गलती से सत्यवान के प्राण वापस करने का वरदान दे चुके हैं।
जब सावित्री पति के प्राण को यमराज के फंदे से छुड़ाने के लिए यमराज के पीछे जा रही थी उस समय वट वृक्ष ने सत्यवान के शव की देख-रेख की थी। पति के प्राण लेकर वापस लौटने पर सावित्री ने वट वृक्ष का आभार व्यक्त करने के लिए उसकी परिक्रमा की इसलिए वट सावित्री व्रत में वृक्ष की परिक्रमा का भी नियम है।
सुहागन स्त्रियां वट सावित्री व्रत के दिन सोलह श्रृंगार करके सिंदूर, रोली, फूल, अक्षत, चना, आम फल और मिठाई से वट वृक्ष की पूजा कर सावित्री, सत्यवान और यमराज की कथा श्रवण कर पूजा करें। ब्राह्मण देव को दक्षिणा आदि सामग्री दान करें।
वट वृक्ष की जड़ को दूध और जल से सींचें। इसके बाद कच्चे सूत को हल्दी में रंगकर वट वृक्ष में लपेटते हुए कम से कम तीन बार, 5 बार, 8 बार, 11 बार, 21 बार, 51, 108 जितनी परिक्रमा कर सके करें। पूजा के बाद वटवृक्ष से सावित्री और यमराज से पति की लंबी आयु एवं संतान हेतु प्रार्थना करें।
बरगद की पूजा जरूर करें…..
ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या तिथि के दिन वटवृक्ष की पूजा का विधान है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन
वटवृक्ष की पूजा से सौभाग्य एवं स्थायी धन और
सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
बरगद के पेड़ को वट का वृक्ष कहा जाता है।
पुराणों में यह स्पष्ट लिखा गया है कि वटवृक्ष की
जड़ों में ब्रह्माजी, तने में विष्णुजी और डालियों
एवं पत्तों में शिव का वास है। इसके नीचे बैठकर
पूजन, व्रत कथा कहने और सुनने से मनोकामना पूरी होती है।
हिन्दू धर्मानुसार 5 वटवृक्षों का महत्व अधिक है
अक्षयवट, पंचवट, वंशीवट, गयावट और सिद्धवट
इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता। संसार में उक्त 5 वटों को पवित्र वट की श्रेणी में रखा गया है।
प्रयाग में अक्षयवट,
नासिक में पंचवट,
वृंदावन में वंशीवट,
गया में गयावट
और
उज्जैन में पवित्र सिद्धवट है।
जहाँ प्रत्येक चौदस अमावस्या
के पहले वाली तिथि को पित्रो को
दूध अर्पित किया जाता है।
मानस से-
तहं पुनि संभु समुझिपन आसन।
बैठे वटतर, करि कमलासन।।
भावार्थ- अर्थात कई सगुण साधकों, ऋषियों यहां तक
कि देवताओं ने भी वटवृक्ष में भगवान विष्णु की उपस्थिति के दर्शन किए हैं।
वट और पीपल के वृक्ष पहले बहुत लगाये जाते थे, ये धर्म से जुड़ा हुआ वृक्ष है, लेकिन आज वर्तमान के लिए यह वृक्ष अति आवश्यक है।

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