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मजदूर दिवस (मई दिवस) ‘मज़दूरों का त्यौहार’ नहीं है, जैसा कि पूंजीपतियों की दलाल ट्रेड यूनियनों ने इस दिन को बना दिया है,

मजदूर दिवस (मई दिवस) ‘मज़दूरों का त्यौहार’ नहीं है, जैसा कि पूंजीपतियों की दलाल ट्रेड यूनियनों ने इस दिन को बना दिया है,

अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस: विश्व-सर्वहारा की एकजुटता एवं सर्वहारा समाजवादी क्रांति हेतु प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने का दिवस!

“राम कुमार सविता”

मजदूर दिवस (मई दिवस) ‘मज़दूरों का त्यौहार’ नहीं है, जैसा कि पूंजीपतियों की दलाल ट्रेड यूनियनों ने इस दिन को बना दिया है, ये मजदूरों व अन्य सभी मेहनतकशों की मुक्ति का प्रारंभिक द्वार है जिसे पार करने के बाद सारी दुनिया के मजदूर, ‘समाजवादी क्रांति’ और ‘मज़दूरों की सत्ता’ की दिशा में आगे बढ़ चले थे।

1886 में 4 मई के दिन लाखों की संख्या में मज़दूरों ने ‘आठ घण्टे का कार्यदिवस’ की मांग को लेकर शिकागो शहर में प्रदर्शन किया जिसके बदले में दो दिन बाद धनपशु शासकों की दरिन्दगी का शिकार होकर उन्हें सड़कों पर अपना खून बहाना पड़ा। यद्यपि हमारे उन्ही पूर्वजों के बलिदान से दुनिया भर के मजदूरों को आठ घण्टे के कार्यदिवस का कानूनी अधिकार प्राप्त जरूर हुआ पर वास्तविकता यह है कि आज भी निर्धारित समय से अधिक काम लिया जाता है और न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती। आज सवा सदी बाद भी काम के वही आठ घण्टे बने हुए है, जबकि विज्ञान-तकनीक के विकास ने जिस हद तक हमें अत्याधुनिक मशीनें और उपकरण उपलब्ध करा दिए हैं, उनके रहते मानवीय श्रम की दैनिक अवधि आधी भी नहीं रह जानी चाहिए थी।

शिकागो की उक्त शोर्यपूर्ण गाथा कोई ‘सत्यनारायण की कथा’ नहीं है जैसे कि मजदूरों के दलाल नेता और उनके संगठन साल-दर-साल कथा’ सुनने-सुनाने की रस्म अदायगी करते चले आ रहे हैं। ये मजदूरों के रक्त में डूबे लाल झंडे की महत्ता की गाथा है, जो हर साल याद दिलाती है कि श्रमिकों के रक्त से रंगे इस झंडे की छाया में सर्वहारा की सत्ता स्थापित करके, शोषण-युक्त दुनिया को शोषण-मुक्त दुनिया बनाने का कार्यभार दुनिया भर के श्रमिकों के कन्धों पर है।
इतिहास हुए अनेकों परिवर्तनों एवं श्रमजीवी वर्ग के असंख्य बलिदानों के बाद भी यदि कुछ नहीं बदला है तो वह है धनपशुओं की सत्ता, मजदूरों-मेहनतकशों का शोषण-उत्पीड़न। श्रमजीवियों को याद रखना चाहिए कि शिकागो के श्रमिकों ने पूँजी के लठैतों के हाथों जो दरिंदगी झेली थी उसमें अभी तक कमी नहीं आई बल्कि दमन के नए-नए हथियारों के साथ और अधिक भयानक रूप में इस समय हमारे सामने है।
मजदूर दिवस एक ऐसा दिन है जिस हम मजदूरों को शिकागो की घटना के बाद के सवा-सदी के इतिहास का सूक्ष्म निरीक्षण करना चाहिए एवं मजदूर आंदोलनों की सफलताओं-असफलताओं से शिक्षा ग्रहण करते हुए भावी रणनीति तैयार करनी चाहिए। इस लम्बी कालावधि में ज्ञान-विज्ञान व तकनीक के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक क्षेत्रों में अनगिनत महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं, इसी कालावधि ने हमें महान अक्टूबर क्रांति दी और फिर उस सफल क्रांति को प्रतिक्रांति के हाथों असफल होते हुए भी देखा।
शिकागो के मजदूरों के संघर्ष ने विश्व-सर्वहारा को एक असीम शक्ति के रूप में संगठित होने की राह दिखाई। इस राह पर चलते हुए दुनिया के मजदूरों ने एक से बढ़कर एक अनगिनत आंदोलन किये जिनकी सफलताओं-असफलताओं में क्रन्तिकारी संघर्षों के ज्ञान-विज्ञान का अकूत भंडार है। मजदूरों के तमाम संघर्षों के निष्कर्ष ही हमारे मार्गदर्शक हैं, ये निष्कर्ष हमें बताते हैं कि कार्यावधि, कार्य-स्थितियों और मजदूरी के लिए शुरू हुआ संघर्ष अब सत्ता के संघर्ष की अवस्था में पहुँच गया है। जैसा कि पूँजी के दलाल व सर्वहारा के गद्दार तथाकथित फ़र्ज़ी मजदूर नेता और उनके संगठन मजदूरों को समझाते हैं कि अभी सत्ता हासिल करना न सिर्फ कठिन है बल्कि संभव ही नहीं है, यह सफ़ेद झूठ है, मजदूरों द्वारा संचालित महान अक्टूबर क्रांति हमें बताती है कि मजदूर वर्ग सत्ता हासिल करने और उसे संचालित करने में पूरी तरह सक्षम है। क्रन्तिकारी संघर्षों के अनेक निष्कर्षों में सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष हैं- सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद एवं मजदूरों की केंद्रीय भूमिका पर आधारित स्वतंत्र मजदूर आंदोलन ।
मजदूर साथियो! अंत में हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हर मजदूर-दिवस के अवसर मोमबत्ती-धूपबत्ती जलाकर और माला पहनकर नहीं, बल्कि पूँजीपतियों व उनकी सरकारों के सुख-चैन में खलल डालकर, उनके कारोबार-व्यापार को ठप्प करके ही शिकागो के श्रमिकों को सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है।
दुनिया के मजदूरों एक हो!
सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद जिन्दावाद!

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