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कांग्रेस का पुनर्गठन …राहुल गांधी का “के कामराज प्लान”…?

कांग्रेस का पुनर्गठन …राहुल गांधी का “के कामराज प्लान”…?

“नई दिल्ली से आलोक मोहन की विशेष रिपोर्ट”

तख्त बदले, ताज बदले, लेकिन न बदले तो कांग्रेश न अपने अंदाज बदले,

आजाद भारत का मुगल सल्तनत कही जाने वाली कांग्रेश के बारे में उक्त बातें सही साबित होती हैं, पूर्व में कई लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद कांग्रेश अपना वही पुराना रवैया अख्तियार करती रही है बिहार के बाद संगठन पार्टी और तमाम अनुषांगिक संगठनों पर सुधार किया जाएगा लेकिन हमेशा की तरह मामला वही ढाक के तीन पात वाला रहा है ऐसा नहीं है कि 2019 में लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद पहली दफा कांग्रेस में उथल-पुथल मची हुई है इतिहास के पन्नों को अगर पलट कर कर कर देखें तो कई बार कांग्रेस में तमाम तरह के उथल-पुथल संगठन और पद तथा प्रतिष्ठा को लेकर सवाल उठते रहे हैं चाहे वह आजादी के पहले का मामला हो जब सुभाष बाबू ने अपने मतभेद उजागर किए थे उसके बाद कई बार कांग्रेस के अधिवेशन में किस तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं जो आजकल राहुल गांधी उठा रहे हैं। राहुल गांधी करारी शिकस्त के बाद पार्टी से इस्तीफा देने पर अड़े हुए हैं पहले भी जब नरसिंगा राव प्रधानमंत्री थे उस समय भी कुछ कांग्रेसी नेताओं ने पीवी नरसिम्हा राव के खिलाफ के बगावत का झंडा बुलंद किया था बाद में सीताराम केसरी के बाद सोनिया गांधी पार्टी की अध्यक्ष बनी तो लोगों को उम्मीद नहीं थी की श्रीमती सोनिया सोनिया गांधी इतने लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष रहेंगी और पार्टी को सर्वोच्च शिखर तक ले जायेंगे इसी उम्मीद के तहत राहुल गांधी को भी पार्टी अध्यक्ष बनाया गया था, आम कांग्रेसियों एवं देशवासियों को उम्मीद थी कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेश कोई बड़ा करिश्मा करेगी लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका। 2014 के लोकसभा चुनाव में सत्ता विरोधी लहर का नुकसान हुआ था क्योंकि पूर्व में यूपीए सरकार पर तमाम तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके थे लोगों के मन में यह था कि मोदी शासनकाल के तमाम जनविरोधी नीतियों का 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस गठबंधन को फायदा होगा लेकिन ऐसा हो पाना संभव नहीं हो पाया चुनाव में करारी शिकस्त के बाद कांग्रेश के वर्तमान नेतृत्व पर तमाम तरह के सवालिया निशान उठाया जाने लगे कोई पुत्र मोह की बात कहता है, तो कोई परिवार वाद का मुद्दा उठाकर आक्षेप लगा रहा है, शायद इसीलिए राहुल गांधी को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा, सच्चाई क्या है यह तो कांग्रेस के ही नेता बता सकते हैं लेकिन इंडियन जंग को मिली जानकारी के मुताबिक राहुल गांधी लंबे समय से परंपरागत परिपाटी से हटकर पार्टी को चलाना चाह रहे थे लेकिन तमाम कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं की वजह से वह नहीं हो पाया और ना वे किसी को पद से हटा पाए, पार्टी संगठन से लेकर के कांग्रेस वर्किंग कमेटी एवं तमाम प्रदेश अध्यक्ष वे लोग हैं जो कहीं ना कहीं से इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक एवं सोनिया गांधी से लेकर उनके साथ अभी भी चल रहे हैं, यह राहुल गांधी का लिहाज समझे या उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि समझें, कि वे चाहते हुए भी इन लोगों को नहीं हटा सकते और परिणाम वही ढाक के तीन पात वाला ही नजर आ रहा है राहुल गांधी को भी इस बात का एहसास है शायद यही वजह है कि वे अपने इस्तीफे पर अड़े हुए हैं, बावजूद इंडियन जंग को मिली जानकारी के मुताबिक अगले कुछ दिनों में कांग्रेस पार्टी में “के कामराज प्लान” का उपयोग किया जा सकता है इस तरह का प्रयास कुछ कांग्रेसी नेताओं ने नरसिम्हा राव के शासनकाल में भी उनके खिलाफ करने का प्रयास किया था, लेकिन संख्या बल कम होने की वजह से वे ऐसा नहीं कर पाए थे लेकिन राहुल गांधी का अब तक का कार्यकाल व उनकी गतिविधियां यह बताती हैं की वह पार्टी हित के आगे किसी का हित नहीं देखते और वे जब कुछ ठान लेते हैं तो उसको करके ही छोड़ते हैं। पार्टी में अध्यक्ष बनने से लेकर अब तक का उनका का जो रवैया रहा है उससे यही लगता है।
यहां यह बता देना उचित होगा कि दक्षिण भारत के
कर्नाटक स्टेट से के कामराज कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में गिने जाते रहे हैं किसी समय में कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे उस समय भी इसी तरह की परिस्थितियां पैदा हुई थी कहा जाता है कि तत्कालीन समय में कांग्रेस पार्टी ने इसी तरह की उथल-पुथल मची हुई थी तो उस समय के कामराज ने सामूहिक तौर पर समस्त कांग्रेसी पदाधिकारियों का व वर्किंग कमेटी के लोगों का सामूहिक इस्तीफा दे दिया था। कहां जा रहा है राहुल गांधी भी अगले कुछ दिनों में कामराज प्लान के तहत संपूर्ण पार्टी के पदाधिकारियों का तमाम प्रदेश अध्यक्षों एवं फ्रंटल संगठनों का इस्तीफा सामूहिक तौर पर ले सकते हैं या मांग सकते हैं। राहुल गांधी अपने कामराज प्लान पर कितना कामयाब हो पाते हैं यह तो समय ही बताएगा लेकिन सच यह है जब तक कांग्रेश पार्टी में उन तमाम नेताओं को संगठन से बाहर नहीं किया जाएगा जो 10-15 साल से एक ही पद पर विराजमान हैं. राहुल गांधी ने इसलिए इस्तीफा पहले दिया जिससे उन पर परिवारवाद का आरोप कोई कांग्रेसी ना लगा सके, सत्य तो यह है कि राहुल गांधी क्या सोचते हैं व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता क्या कहते हैं यह उनका अपना सोचने का अलग तरीका हो सकता है लेकिन सच्चाई यह है की गत तीन दशकों से कांग्रेस पार्टी में ना तो कोई पिछड़ा वर्ग के नेता तैयार किया और ना दलित नेता उभार पर आया और ना कोई मुस्लिम चेहरा.. देश की आम जनता यह बार-बार जानना चाहती है की जगजीवन राम के बाद उनकी बेटी मीरा कुमार आ जाती है तथा पिछड़े वर्ग के वही नेता भी बार-बार आते हैं जो कई दशकों से कांग्रेश की माल और मलाई खा रहे हैं, मुस्लिम लीडरशिप में भी वही हाल है, विपक्षी दलों के तमाम नेताओं ने व पार्टियों ने कांग्रेश की इन्हीं खामियों का फायदा उठाकर अपने वोट बैंक को मजबूत किया है। यहां यह बताना उचित होगा बीएसपी का वोट बैंक वही है जो किसी समय कांग्रेस का परंपरागत वोट हुआ करता था. समाजवादी पार्टी से ताल्लुक रखने वाले समाजवादी विचारधारा के लोगों का वोट बैंक भी वही है जो कांग्रेस का मजबूत हिस्सा हुआ करता था, कांग्रेस, बसपा,सपा, आरजेडी वर्तमान क्षेत्रीय पार्टियों के वोट बैंक पर पहली दफा भारतीय जनता पार्टी पूरी तौर पर सेंध लगाने में कामयाब हुई और कांग्रेस के तमाम नेता हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे इसकी वजह यह है बीजेपी में सर्वाधिक पिछड़े वर्गों के अति पिछड़ी जातियों एवं उप प्रजा जातियों को ना केवल टिकट दिया बल्कि उनको लोकसभा व विधानसभा में जिता करके भी लाएं और उनको तमाम संसाधन दी, जबकि कांग्रेस में गत तीन दशकों से इस परंपरागत वोट पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया आज अगर कांग्रेस पार्टी की हालत 52 सीटों तक सिमट कर रह गई है और दो तीन राज्य में ही उनकी उनकी सरकार है तो इसके लिए स्वयं कांग्रेस के नेता ही और उसकी कार्यशैली जिम्मेदार है, जबकि सपा, आरजेडी, आरएलडी एवं अन्य कई क्षेत्रीय पार्टियां अपने परिवार वाद की जकड़ से बाहर नहीं निकल पाई आम जनता ने इन पार्टियों को भी करारी शिकस्त देकर परिवारवाद की राजनीति को धता बताकर उनको सबक सिखाने का काम किया है, अब देखना यह है कि कांग्रेस पार्टी व उनके साथ चलने वाले समान विचारधारा वाले दल अगर 2019 के लोकसभा चुनाव से परिणाम से भी सबक नहीं लेते हैं तो आने वाले विधानसभा चुनाव व आगामी लोकसभा में आम जनता सबक सिखा देगी, इनसे बड़ा सवाल कांग्रेश की प्रतिष्ठा का है, अब कांग्रेस को तय करना है की पार्टी बचानी है या नेता बचाना है यह बहुत कुछ कांग्रेस के उन तमाम नेताओं पर आश्रित है जो पूरी पार्टी में लंबे समय से कुंडली मारे बैठे हैं।

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