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कहीं,बहादुर शाह “ज़फ़र” न बन जायें मोदी..!!!

कहीं,बहादुर शाह “ज़फ़र” न बन जायें मोदी..!!!

ज़फ़र ने तब लिखा था और जो लिखा था वही सत्ता का दस्तूर है नरेंद्र मोदी ने चुनावी सभा में कह दिया है कि हिम्मत हो तो दो फ़ेज़ राजीव गांधी के नाम पर लड़ लें..जिस पर कहना होगा कि राजीव की मृत्यु ३० साल पहले हो चुकी है अब,उन्हें मुद्दा बनाने का माद्दा या तो मोदी में ही हो सकता है या फिर बहादुर शाह की उस शायरी में जो उन्होंने गद्दी छीन जाने के बाद लिखी थी –
ऐ वाय इंक़लाब
ज़माने के ज़ोर से
दिल्ली ‘ज़फ़र’ के
हाथ से पल में
निकल गई..,
मोदी ने बहुत कुछ कहा साथ में ये भी कह दिया कि देखिये “खेल,कैसे खेला जाता है,दम हो तो भोपाल हो,दिल्ली हो,पंजाब हो,राजीव के मान सम्मान के मुद्दे पर हो जाये चुनाव..यह मेरी चुनौती है..,
लिखना होगा कि यह कैसी दिग्भ्रमित दशा है जबकि दीनदयाल,श्यामा प्रसाद अथवा अटल के नाम लेने पर मोदी को परहेज़ है बल्कि राजीव पर जो आरोप सिद्ध न हो सके उस पर चुनौती दी जा रही है “बिल्ली,खम्भे नोच रही है या खम्भा बिल्ली को ठेंगा दिखा रहा है..,मोदी जिस दो राहें पर हैं जहाँ सरकार की उपलब्धि नगण्य है और जनता का सामना करना है तो झगड़ालू औरत बन गये हैं हताश और बेबस ‘ज़फ़र’ने लिखा था वह मोदी पर चरितार्थ हुआ जा रहा है कि-
जा कहियो
मेरा नसीम-
ए-सहर
मिरा चैन
गया,मेरी
नींद गई..,
मर्यादा की दुहाई देते हुए उन्होंने ताल ठोंक दिया और कह दिया कि मैंने बोफ़ोर्स की याद दिलाई तो तूफ़ाँ आ गया..पर,हमारा सवाल ये है कि उस बोफ़ोर्स की जो कभी साबित नहीं हुआ..मोदी की हारी और थकी हुई मानसिकता पर “ज़फ़र” ने लिखा था-
कह दो इन
हसरतों से
कहीं और
जा बसें
इतनी “जगह”
कहाँ है दिल-
ए-दाग़-दार में..,

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