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नारायणपुर-बोरपाल गांव में कैम्प लगा कर शिक्षा,स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति ग्रामीणों को जागरूक किया,माड़ रक्षा सेवा संस्थान के युवा सदस्य अपने अभियान पर..

नारायणपुर-बोरपाल गांव में कैम्प लगा कर शिक्षा,स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति ग्रामीणों को जागरूक किया,माड़ रक्षा सेवा संस्थान के युवा सदस्य अपने अभियान पर..

बस्तर में जहाँ एक तरफ चुनावी माहौल के बीच दोनों तरफ के वर्गों के बीच खूनी संघर्ष जारी है। दोनों तरफ के हिंसक संघर्ष की कीमत बस्तर(माड़)की जनता सबसे ज्यादा चुका रही है। वहीं दूसरी तरफ माड़ रक्षा सेवा संस्थान नारायणपुर के युवा सदस्यो ने यह तय किया है,कि देश की मुख्यधारा से कटे क्षेत्र के आदिवासी भाई-बहनों के बीच निरन्तर अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर उन्हें स-सम्मान वापस मुख्यधारा से जोड़े। इस क्रम में संस्था के युवा वालेन्टियरों ने प्रतिमाह नरायणपुर जिले के अलग-अलग दूरस्थ मावोवाद हिंसा प्रभावित पहुंच विहीन गांवों में कैम्प लगाकर स्थानीय लोगों में शिक्षा,स्वास्थ्य,स्वच्छता और रोजगार सहित स्थानीय समाजिक मुद्दों के प्रति जागरूक करने में लगे है।

संस्था के युवा सदस्य इस कार्य के लिए ग्रामीणों के सांथ उनकी ही पसंदीदा शैली सामंजस्य बिठाते हुए उनसे सहज बातचीत करते हुए उनकी समस्याओं और जरूरतों की जानकारी लेकर उसे स्थानीय जिला प्रसाशन के समक्ष रखने का काम भी बखूबी कर रहे हैं। इस बार माड़ रक्षक सेवा संस्थान के युवा वालेन्टियरों ने संस्थान के बैनर तले दिनांक 27 अप्रैल 2019 को नारायणपुर जिला मुख्यालय से करीब 15 किमी अंदर बोरपाल गांव कैम्प लगाया। कैम्प के माध्यम से युवाओ ने गांव में चौपाल लगाई फिर लोगो को स्वास्थ्य,शिक्षा, साफ-सफाई,मौसमी और संक्रामक बीमारियों से बचाव शौचालाय का इस्तेमाल जैसे आवश्यक एवं सामाजिक विषयों पर जागरूक किया। इसके अलावा कैम्प में आये गांव के लोगो की परेशानियाँ सुनी,उनके निवारण का भरोसा दिलाया।

ग्रामीणों ने अपनी समश्याओं में राशन कार्ड, स्ट्रीट-लाइट की कमी,पीने के साफ पानी जैसी समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। जिसके समाधान के लिए युवाओं ग्रामीणों को नारायणपुर जिला-मुख्यालय आमंत्रित किया। ताकि वे ग्रामीणों के सांथ जिला कलेक्टर के पास जाएंगे और उनसे आग्रह कर ग्रामीणों की समस्या का स्थाई समाधान करने प्रयास करेंगे। ग्राम बोरपाल में कैम्पिंग के लिए स्थानीय ग्रामीणों के सांथ ग्राम पटेल जयलाल उसेंडी के अलावा मितानिन और आंगनबाड़ी की महिला कार्यकर्ताओं ने भी भरपूर सहयोग किया। जबकि माड़ रक्षक सेवा संस्थान के इस कैम्पिंग कार्यक्रम में शामिल होने वाले युवा वालेंन्टियरों में सर्वप्रथम शशांक तिवारी,अजय सरकार,विनय ओस्तवाल,अर्जुन सुराना,सुरेश गुप्ता पीकू गाइन प्रमुख रहे। वहीं बोरपाल कैम्पिंग को सफल बनाने में औद्योगिक नगरी भिलाई से शीतल मिश्रा सहित ओंकार देवांगन ने भी महवपूर्ण भूमिका निभाई। . *कैम्पिंग में क्या रहा विशेष*– ग्राम बोरपाल जो जिला मुख्यालय नारायणपुर से करीब 15 किमी दूर स्थित माओवाद हिंसा प्रभावित गांव है। इस गांव की कुल आबादी करीब 5 सौ के आसपास है। गांव की बसाहट सुदूर बस्तियों के रूप में हुई है। अतः हर बस्ती की अपनी निजी मूलभूत समश्या जाहिर सी बात है। वही जिला मुख्यालय से महज 15 किमी की दूरी पर स्थित इस वनग्राम को अभी भी विकास की मुख्यधारा से पूरी तरह नही जोड़ पाना बड़ी विडंबना है। बहरहाल इस कैम्प की विशेषताओं को बताते हुए युवा सदस्य शशांक तिवारी कहते हैं कि बोरपाल कैम्प में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि *ग्रामीण महिलाओं ने बस्तर के वनग्रामों की पारम्परिक रोजगार कुशलता का परिचय देते हुए बड़ी कुशलता और तत्परता से सामूहिक भोजन के लिए सैकड़ों हरे पत्तों का दोना-पत्तल बनाया फिर उस पर भोजन करवाया।* वहीं संस्थान के युवा वालेन्टियरों ने अपने यूनिफार्म टीशर्ट पर *माड़ पुत्र टाइगर बॉय चेंदरू* की इमेज वाली तस्वीर छपवा ली थी। जिसकी वजह से ग्रामीण बच्चे और युवा उनसे सहज रूप में जुड़ने लगे। वालेन्टियरों ने अपने सांथ लाए कपड़े,चाकलेट्स और बिस्किट्स बच्चों में बांटी और उन्हें हर हाल में स्कूल जा कर शिक्षा ग्रहण करने की सलाह दी .. *कौन था टाइगर बाय चेंदरू* नारायणपुर जिला मुख्यालय से महज 7 किमी की दूरी पर स्थित वनग्राम गढ़बेंगाल का निवासी चेंदरू अपने साहस और जिंदादिली के लिए विश्व प्रसिद्ध व्यक्त्तिव बन गए थे। उनकी प्रसिद्धि माड़ से निकलकर हॉलीवुड के सुनहरी स्क्रीन तक पहुंच गई थी। उनके विषय मे बताया जाता है,कि अरने सक्सडोर्फ नाम के निर्माता ने उन पर एक फ़िल्म बनाई थी *“द फ्लूट एंड द एरो” जिसे भारत मे नाम दिया गया *“द जंगल सागा”*। फ़िल्म अंतराष्ट्रीय स्तर पर खूब सफल रही। 1957 में बनी इस फ़िल्म को 1958 के कांस फ़िल्म फेस्टिवल में भी जगह मिली। फ़िल्म की शूटिंग के समय अरेन सक्सडोर्फ और चेंदरू में एक रिश्ता सा बन गया। अरने सक्सडोर्फ के शब्द थे कि वह चेंदरू को अपने बेटे की तरह देखते थे। फ़िल्म की वजह से चेंदरू और टेम्बू कि कहानी दुनिया ने देखी, अब दुनिया चेंदरू को करीब से देखने की लालसा में थी। अरेन भी चाहते थे कि चेंदरू वो जगह देखे जहाँ से वह आये है, तो उन्होंने चेंदरू को स्वीडन ले जाने का सोचा। और वो उसे स्वीडन ले गए।स्वीडन चेंदरू के लिये एक अलग ही दुनिया थी, अरेन ने उसे एक परिवार का माहौल दिया, उन्होंने उसे अपने घर पर ही रखा और अरेन की पत्नी “अस्त्रिड सक्सडोर्फ” ने चेंदरू की अपने बेटे की तरह देखरेख की। अस्त्रिड एक सफल फोटोग्राफर थी, फ़िल्म शूटिंग के समय उन्होंने चेंदरू की कई तस्वीरें खीची और एक किताब भी प्रकाशित की *“चेंदरू – द बॉय एंड द टाइगर”*। स्वीडन में चेंदरू करीब एक साल तक रहा, उस दौरान उसने बहुत सी प्रेस कॉन्फ्रेंस, फ़िल्म स्क्रीनिंग की, और अपने चाहने वालो से मिला। दुनिया उतावली थी उस बाल कलाकार से मिलने जिसकी दोस्ती एक बाघ से है, जो एक बाघ के साथ रहता है। पूरा विश्व अब चेंदरू को टाइगर बॉय के नाम से जानने लगा। एक साल बाद चेंदरू स्वदेश वापस लौटा। मुम्बई पहुँच कर उसकी मुलाकात हुई तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से, उन्होंने चेंदरू को पढ़ने के लिये कहा, पर चेंदरू के पिता ने उसे वापस बुला लिया।

चेंदरू अब बस्तर के अपने गांव वापस आ गया, पर वापस आने के कुछ दिनों बाद टेम्बू चल बसा। चेंदरू उदास रहने लगा पर वह धीरे धीरे पुरानी ज़िन्दगी में लौटा और फिर गुमनाम हो गया। गुमनामी की ज़िंदगी जीते चन्दरु की 2013 में खबर आई,पर वह खबर उसकी मौत की थी। तत्कालीन सरकारों की अंदेखियाँ ने गुमनामी में खोए हॉलीवुड के उस सितारे के लिये कोई सार्वजनिक शोक-सभा तक आयोजित नही की।, सब उसे भूल चुके थे । अंत मे सरकार को होश आया और रायपुर में निर्मित जंगल सफारी में “टेम्बू और चेंदरू” की एक मूर्ति स्थापित कर महज खाना पूर्ति कर गई।

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