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“ हद”

“ हद”

सुनो ,कहाँ तक है
मेरी हद ,
तुम्हीं करो निर्धारित,
मैं नहीं जान पाती हूँ,
और पार कर जाती हूँ
तुम्हारी तय की हुई हद,
मुझे बाँधो मेरी सीमा में,
क्योंकि मैं एक ,
औरत हूँ और,
शायद हद में ,
रहना है जरुरी ,
मुझे बेहद,
शायद मेरा अंत ही ,
ले जाये मुझे वहाँ ,
जहाँ अंतहीन आकाश हो,
और मेरी मर्यादा ,
मेरी अस्मिता की ना हो,
कोई हद ,
क्यूँकि युगों युगों से ,
बाँधा है तुमने हमेशा,
झूठी मर्यादा के नाम पर,
खींची है मेरे लिये ,
लक्ष्मण रेखा तुमने ,
मैं अब उस अनंत में ,
समा जाना चाहती हूँ,
तुम्हारी तय की हुई
हद से गुज़र जाना ,
चाहती हूँ,
मैं अंतहीन हो जाना ,
चाहती हूँ।।

\\ नीलिमा मिश्रा//

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