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रायपुर । 23 मार्च: इस देश में सारी विचारधाराओं को आज़माया जा चुका है. अब समय भगत सिंह और डॉ अंबेडकर के विचारों को आज़माने का है. ये विचार हैं वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के.

रायपुर । 23 मार्च: इस देश में सारी विचारधाराओं को आज़माया जा चुका है. अब समय भगत सिंह और डॉ अंबेडकर के विचारों को आज़माने का है. ये विचार हैं वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के.

वे शनिवार को गांधी ग्लोबल फ़ैमिली द्वारा रायपुर प्रेस क्लब में आयोजित ‘भगत सिंह का भारत’ विषय पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि आज़ादी की लड़ाई के दौर में भी एक वर्ग ऐसा था, जो भारत को अतीत में ले जाने का पक्षधर था. उर्मिलेश ने कहा कि भगत सिंह के बारे में यह आम धारणा थी कि वे एक बहादुर और लड़ाका जन नायक थे. लेकिन बाद में जब उनके भांजे जगमोहन सिंह और चमनलाल ने उनके वैचारिक पक्ष को सामने लाया तो भगत सिंह का वास्तविक चेहरा सामने आया. भगत सिंह के सपनों के भारत की तस्वीर पहली बार सामने आई.

उर्मिलेश ने भगत सिंह के लेखों को उद्धृत करते हुये कहा कि भगत सिंह की सांप्रदायिकता को लेकर एक साफ़ दृष्टि थी और वे राजनीति को धर्म से अलग रखने के पक्षधर थे.

उन्होंने कहा कि आज़ादी की लडाई में अंबेडकर के अलावा अगर दलित मुद्दों पर कोई और भी सोच रहा था, वे भगत सिंह ही थे. पंजाबी की कीर्ति पत्रिका में प्रकाशित उनके एक लेख का हवाला देते हुये उर्मिलेश ने कहा कि भगत सिंह ने दलित समस्या को बजबजाता हुआ नाला मानते हुये उस पर कई गंभीर सवाल उठाये.

आइडिया ऑफ़ इंडिया का उल्लेख करते हुये उर्मिलेश ने कहा कि नेहरु की आलोचना करने वालों को इतिहास का ज्ञान नहीं है. इसलिये ऐसे लोग हमेशा इतिहास और ज्ञान पर हमला करते हैं.

उर्मिलेश ने भगत सिंह को जानने के लिये मैं नास्तिक क्यों हूँ और कविता संग्रह ड्रीमलैंड की भूमिका पढ़े जाने पर ज़ोर देते हुये कहा कि एक नये भारत के निर्माण के लिये आज भगत सिंह और अंबेडकर को आज़माये जाने की जरुरत है.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुये आलोचक प्रोफ़ेसर सियाराम शर्मा ने कहा कि भगत सिंह के सपनों का भारत किसानों और मज़दूरों का भारत था. आज़ादी के दौर में किसान फाँसी पर लटकाये जा रहे थे लेकिन वे आत्महत्या नहीं करते थे. लेकिन पिछले तीस सालों में देश में चार लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली.

उन्होंने कहा कि भगत सिंह ने मज़दूरों के मुद्दों पर असेंबली में बम फेंका था लेकिन आज विकास के दावों के बीच मज़दूरों की हालात लगातार खराब होती जा रही है, किसान, मज़दूर, बुनकर हाशिये पर हैं.

सियाराम शर्मा ने कहा कि भगत सिंह के पास आज़ादी का और आज़ाद भारत का एक पूरा ख़ाका था. वे साम्राज्यवाद से दो दो हाथ करने के लिये तैयार थे.

उन्होंने कहा कि पिछले तीस सालों के साम्राज्यवादी हमलों को देखें तो समझ में आता है कि उपनिवेशवाद से तो हमें आज़ादी मिली थी लेकिन नव उपनिवेशवाद ने हमें ऐसे जकड़ लिया, जिसमें व्यापक पैमाने पर बेरोज़गारी फैलती चली गई. अमीर और ग़रीब के बीच व्यापक खाई बढ़ती चली गई.

प्रोफ़ेसर सियाराम शर्मा ने कहा कि पिछले पाँच सालों में तर्क और विज्ञान को ख़ारिज कर के झूठ और अवैज्ञानिकता को तेज़ी से बढ़ावा दिया गया. उन्होंने कहा की भगत सिंह कहते थे कि पढ़ो, आलोचना करो, सोचो और फिर विचार बनाओ. आज भगत सिंह के इस विचार को अपनाने की जरुरत है.

इस अवसर पर उपस्थित श्रोताओं के साथ सवाल जवाब का दौर भी चला. कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राकेश गुप्ता ने किया.

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