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ये औरतें

ये औरतें

“ये औरतें”
ये औरतें ज़िम्मेदारियों के बोझ से दबी
ये औरतें,
मुँह अंधेरे उठतीं बच्चों को उठाती
ये औरतें,
स्कूल ड्रेस टिफ़िन तैयार करती
बदहवास ये औरतें,
बस तक छोड़ती दौड़ती हाँफती
ये औरतें,
सबका चाय नाश्ता तैयार करतीं
ये औरतें,
सबके उलाहने सुनतीं कुढ़ती जलतीं
ये औरतें,
घरेलु कामों से फ़ुरसत पा बालों में कंघा
फेरतीं ये औरतें,
नीलिमाअच्छी सी साड़ी पहन आइने में खुद को
निहारतीं ये औरतें,
दिलफरेब मुस्कान चेहरे पे चिपका पर्स
लटकाती ये औरतें,
घरों से निकलतीं थोड़ा सा जीने के लिये
साँस लेती ये औरतें,
सहेलियों की गोष्ठी में बतियाती सुख
दुख बटोरती ये औरतें,
कुछ देर सिर्फ अपने जीने के लिये थोड़ा
हँसती रोती ये औरतें,
थोड़ा मन की कर फिर से ऊर्जावान् हो
उठतीं ये औरतें,
सिर्फ अपने लिये दो पल जीतीं स्फुरित
हो उठतीं ये औरतें,
क्योंकि ये जानती हैं पहर ढलते ढलते
अपने बसेरे में लौट जाना है,
गृहस्थी के महासमर में फिर जुट
जाना है,
कामों के बोझ तले सुकून की साँस के
लिये तरसती अगर अपने लिये
दो पल जी लेती हैं तो क्या बुरा
करती हैं ये औरतें
ये भी तो भावनाओं से इच्छाओं से
भरी हैं,
गहरे शांत झील की तरह
अपने जीवन में ठहरी हैं
ये औरतें ।।

नीलिमा मिश्रा//

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