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वनों में सामुदायिक अधिकार के लिए मजबूत कानून चाहिए-जंगल मतलब आदिवासी,आदिवासी मतलब जंगल-एक सिक्के के दो पहलू…

वनों में सामुदायिक अधिकार के लिए मजबूत कानून चाहिए-जंगल मतलब आदिवासी,आदिवासी मतलब जंगल-एक सिक्के के दो पहलू…

आदिवासी समाज के अलग-अलग संगठनों और कुछ राजनैतिक समूहों ने वनाधिकार कानून पर मा. उच्चतम न्यायालय के 13 फ़रवरी के फ़ैसले (वाईल्डलाइफ़ फ़र्स्ट बनाम पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार) को लेकर भड़काने का काम शुरु किया है। आदिवासी अधिकारों के संघर्ष में अक्सर ही बेईमानी और डेढ़-दिमागी से नेतृत्व किया जाता रहा है, और संविधान-विधि अथवा आदिवासी जीवन-दर्शन की गहरी समझ विकसित करने की मेहनत से बचा जाता रहा है। आदिवासी-हित के असली मुद्दों और असली संघर्ष को क्षुद्र राजनैतिक खिलवाड़ में गुमा न दिया जाए इसलिए आदिवासी छात्र संगठन कुछ बिंदुओं पर विधिवेत्ता श्री बी. के. मनीष के सहयोग से स्पष्टता प्रदान करने का प्रयास कर रहा है।

वर्ष 2008 में एक स्वयं सेवी संगठन एवं कुछ सेवानिवृत्त वन-सेवा के अधिकारियों द्वारा दाखिल इस मुकद्दमें में वनाधिकार कानून 2006 की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी। लेकिन अब तक इस कानून के किसी भी प्रावधान को मा. उच्चतम न्यायालय ने असंवैधानिक नहीं ठहराया है। किसी एक पेशी में अधिवक्ता की अनुपस्थिति के आधार पर भारत सरकार द्वारा इस कानून के संरक्षण में विफल रहने का आरोप बचकाना है।

मा. उच्चतम न्यायालय वनाच्छादन के घटते स्तर और वनाधिकार कानून के लागू होने के बाद दावे पेश किए जाने के लिए हुई अंधाधुंध वन कटाई को लेकर चिंतित रहा है। इक्कीस राज्यों को यह निर्देशित किया गया है कि जिन व्यक्तियों के दावे इस कानून के तहत खारिज किए जा चुके हैं उन सभी अवैध कब्जाधारियों को वन क्षेत्र से बेदखल किया जाए। फ़ारेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया को सैटेलाईट की मदद से अवैध कब्जे की स्थिति पर रिपोर्ट देने को भी कहा गया है।

सामाजिक संगठनों और संबद्ध राज्य सरकारों को यह देखना होगा कि जंगल में रहने वाले पारंपरिक समूहों में से कौन कौन व्यक्ति-परिवार इस कानून की मान्यता पाने से वंचित रह गये हैं (सभी खारिज किए गए दावे ज़रूरी नहीं कि असली हों)। इस काम को युद्ध स्तर पर निपटा कर जुलाई से पहले अपनी कार्य-योजना बनानी होगी। यदि कोई असली पारंपरिक समूह बेदखल किए जाने के खतरे में हो तो राज्य शासन द्वारा उनको पांचवीं अनुसूची के पैरा पांच (एक) के तहत अधिसूचना मात्र प्रकाशित कर के मा. उच्चतम न्यायालय के फ़ैसले के प्रभाव से सुरक्षित किया जा सकता है।

आदिवासी छात्र संगठन का स्पष्ट मत है कि आदिवासी-हित और वन-संरक्षण दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वन-भूमि पर नौकरशाही की औपचारिकता के घेरे में, किसी भी तरह का व्यक्तिगत अधिकार दिए जाने और पट्टा दिए जाने को हम आदिवासी-हित के विरुद्ध मानते हैं। विशुद्ध पारंपरिक ढंग से वनों का संरक्षण और स्वामित्व स्थानीय समुदाय में निहित होने की हमारी स्पष्ट मांग है। वनाधिकार कानून 2006 कच्ची समझ के समूहों द्वारा गढ़ा गया एक कानून है जो कि आदिवासी जीवन-दर्शन के विरुद्ध है। यह कानून जंगल से जुड़ाव की ओर नहीं बल्कि व्यक्तिगत संपत्ति के आर्य दर्शन की ओर लेकर जाता है। दीर्घकालिक उपाय के लिए आदिवासी समाज को एकजुट होकर (और अपने बीच के अधकचरा-स्वार्थी तत्वों को नेतृत्व से हटा कर) संसद से एक नया, युक्तिसंगत कानून पारित कराए जाने के लिए संघर्ष करना होगा।

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