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तीसरे मोर्चे की बढ़ती ताकत से परहेज क्यो..?

तीसरे मोर्चे की बढ़ती ताकत से परहेज क्यो..?

दिल्ली से आलोक मोहन

1967 से लेकर अब तक जितने भी आम चुनाव हुए हैं उन चुनावों में गैर कांग्रेस वाद के खिलाफ कई नई राजनीतिक पार्टियां उभर कर सामने आई..,इनमें चाहे वह इमरजेंसी के बाद “जनता पार्टी” का गठन हो अथवा बोफोर्स घोटाले के बाद मंडल व कमण्डल की राजनीति के चलते वी.पी.सिंह का “जनमोर्चा” हो अथवा “भारतीय जनता पार्टी” या फिर कई टुकडों में बंट चुके “जनता दल”,”लोकदल”, “जनता दल सेकुलर”, “समाजवादी पार्टी” बासपा, आदि का उभार उत्तर भारत के राज्यों में देखा जा सकता है। इस तरह दक्षिण भारत के कई राज्य में भी 80 के दशक के दौर से कई क्षेत्रीय दल अपनी ताकत को मजबूत करने में कामयाब रहे। तमिलनाडु में एमजी.रामचन्द्र, के करुणानिधि, जयललिता,एव एम. के स्टालिन अपनी ताकत के बल पर ऊभार पर आए, तो दूसरी तरफ “एन टी रमा राव” के बाद उनके दामाद “चन्द्रबाबू नायडू”, नए राज्य में तब्दील हुये तेलंगाना के “चंद्रशेखर राव” को भी तीसरे मोर्चे की ताक़त के रूप में देखा जाना चाहिए। इसी तरह कर्नाटक में पूर्व प्रधानमंत्री “एच. देबगौड़ा” की पार्टी “जनता दल सेकुलर”, जो वर्तमान में कांग्रेस के सहयोग से सत्ता में काबिज है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस से अलग मोर्चा बनाकर पश्चिम बंगाल में त्रिमूल कांग्रेस बतौर काबिज ममता बनर्जी, बिहार में लालू प्रसाद यादव, जम्मू कश्मीर में बीजेपी की महबूबा मुफ्ती आदि सभी को तीसरे मोर्चे के भावी मजबूत घटक दलों के रूप में ही देखा जाना चाहिए, अगर उक्त राज्यों के लोकसभा सीटों के गणित पर नजर दौड़ाए तो उससे साफ झलकता है कि अगर ये सारे दल अपने अपने राज्यों में मजबूती से चुनाव मैदान में डटे रहकर बेहतर रिजल्ट लाते हैं तो उनके सांसदों की संख्या तकरीबन 250 के आस पास पहुँचती है। अगर ये सारे नेता गैर कांग्रेस, गैर भजपा के खिलाफ लामबंद होकर चुनाव मैदान में मजबूती से उतरते हैं तो भाजपा एवं कांग्रेस का सत्ता में काबिज होने का सपना चकनाचूर हो सकता है। शायद यही वजह है की भाजपा व कांग्रेस एक दूसरे के खिलाफ मैदान में खड़े नजर तो आते हैं लेकिन इन दोनों दलों की कोशिश है जो लोग तीसरे मोर्चे की मजबूती के लिए मजबूती की कवायद में लगे हैं वे कमजोर हों…?

वह इसलिए की इनको पता है थर्ड फ़्रंट के घटक दल अपने अपने राज्यों में मजबूत होंगे तो वे( भाजपा-कांग्रेस) अपने मुताबिक देश का अगला प्रधानमंत्री नही बनवा पाएंगे।इसलिए तीसरे मोर्चे के कमजोरी का फायदा ये दल उठाना चाहेंगे, सच तो यह है कांग्रेस बाहर से भले ही वर्तमान केंद्र सरकार के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष दलों को एक मंच पर लाकर चुनाव लड़ने की बात कर रही है लेकिन अंदर खाने में ममता से लेकर माया अखिलेश से लेकर तेजप्रताप आदि से इनको परहेज भी है। इसलिए सम्भावना इस बात की बलवति हो रही है। उससे लगता है जैसे जैसे आम चुनाव नजदीक आएंगे तीसरे मोर्चे की कवायद में लगे दल मजबूत होंगे। ये लोग जितने मजबूत होंगे भाजपा और कांग्रेस उतनी ही कमजोर होगी।

लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं【नई दिल्ली】

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