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आसान नही उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की वापसी

आसान नही उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की वापसी

आलोक मोहन//

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की दुर्गती के लिए विपक्षी दलों के बजाय कांग्रेस के ही देश-प्रदेश के नेता ही जिम्मेदार है, एक समय था जब कांग्रेस पार्टी के अलावा विपक्ष में वामपंथी एव सोसलिस्ट पार्टियां ही हुआ करती थी।

कांगेस के तमाम नेताओं को लगता था हमे कोई चुनोती देने वाला नही है, कुछ हद तक यह सही भी था। लेकिन राजनीति करवट कब लेगी कह पाना मुश्किल है,खासकर अस्सी के दशक में जब से मंडल और कमण्डल की राजनीति शुरू हुई उससे कांग्रेस पार्टी का परंपरागत वोट क्षेत्रीय पार्टियों में चला गया। बसपा के पास जंहा दलित वोटर चला गया तो पिछड़े वर्गों का वोट पर अन्य दलों का कब्जा हो गया। इस दौरान उत्तरप्रदेश के कांग्रेस में ब्राह्मण वादी लाबी ने बचे खुचे वोटरों को अपनों से दूर कर लिया।

परिणाम ये निकला कि दर्जनो सांसदों व सौकड़ो विधयकों वाली पार्टी एक सीमित दायरे में कैद होकर रह गयी। तथा इस दौरान सूबे तथा केंद्र में उत्तरप्रदेश कांग्रेस की कमान जिनके हाथ में थी उनके हाथ प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में अपने वर्चस्व को ही कायम रखा। आम जनता व स्थानीय प्रभुत्व वाले लोगों को आगे बढ़ने का मौका नही दिया, एक तरह से कांग्रेस में सामंतवादी व्यवस्था कायम रखा। आज अगर कांग्रेस के साथ उत्तरप्रदेश में दलित,अति पिछड़ा वर्ग(प्रजा जातियां) एव अल्पसंख्यक दूर है तो उसकी वजह इन वर्गों के लोगों को न तो पार्टी संगठन में और न ही लोकसभा व विधानसभा चुनाव में समुचित तरीके से टिकट का न दिया जाना रहा है।

बचा खुचा जातीवादी व सम्प्रदाय वादी राजनीति चौपट कर दी। दो दशक के बाद पहली बार कांग्रेस के उच्चस्तरीय लीडर शिप ने अकेले दम पर लोकसभा चुनाव में उतरने का जो फैसला किया है उसे पूरे सूबे में सकारात्मक संदेश गया है।प्रियंका गांधी एवं ज्योतिरादित्य सिंधिया उत्तरप्रदेश में कांग्रेस के मजबूती के लिए जो पहल की है उससे चुनावी परिणाम क्या होंगे ये अलग पहलू हो सकता है लेकिन उक्त दोनों के आने से उत्तरप्रदेश में जाति ओर सम्प्रदाय में लंबे समय से जो घालमेल चल रहा है, आम जनता इससे निज़ात चाहती है। श्रीमती प्रियंका गांधी के आने से तमाम दलों में बैचैनी जरूर बढ़ गयी है, जो सूबे में एकाधिकार की राजनीति चाहते हैं।

‌अस्सी सांसदों वाले सूबे के सोलहवीं लोकसभा में भले ही दो सांसद हो लेकिन सत्रहवीं लोकसभा चुनाव में ये संख्या दो दर्जन से ज्यादा भी हो सकती है यह तभी सम्भव है जब कांग्रेस पार्टी नए व अतिपिछड़ों एवं परिवारवाद से हटकर व साफ सुथरी छवि वालों को टिकट दे।

लेखक राजनीति विश्लेषक हैं【दिल्ली】

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