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रॉ के पूर्व प्रमुख का बड़ा खुलासा-आडवाणी के पास थी करगिल युद्ध होने से पहले खुफिया जानकारी

रॉ के पूर्व प्रमुख का बड़ा खुलासा-आडवाणी के पास थी करगिल युद्ध होने से पहले खुफिया जानकारी

केवल खुफिया जानकारी होने से ही युद्ध नहीं टाले जा सकते
चंडीगढ़ -भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के प्रमुख रह चुके अमरजीत सिंह दुलत ने खुलासा किया है कि 1999 में हुए करगिल युद्ध से जुड़ी अहम खुफिया जानकारियां तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी को समय रहते दे दी गई थीं। दुलत का यह खुलासा उस आम धारणा के विपरीत है जिसके मुताबिक करगिल युद्ध को खुफिया एजेंसियों की नाकामी माना जाता है।
दुलत जो करगिल युद्ध के समय इंटेलिजेंस ब्यूरो में थे, शनिवार को चंडीगढ़ में आयोजित सैन्य साहित्य महोत्सव में एक चर्चा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा, हमें कुछ असामान्य गतिविधियों की सूचना मिली थी। यह जानकारी सेना की टिप्पणियों के साथ गृह मंत्रालय तक पहुंचा दी गई थी। यह पूछे जाने पर कि क्या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान पाकिस्तानी सेना के हाथों की कठपुतली हैं, दुलत का कहना था कि अभी हमें इमरान को और समय देना चाहिए। उन्होंने जोड़ा, हाल ही में इमरान ने कहा था कि 2008 में हुआ मुंबई अटैक आतंकवादी घटना थी।
चर्चा में भाग लेने वाले दूसरे वक्ता- लेफ्टिनेंट जनरल कमल डावर (रिटायर्ड), लेफ्टिनेंट जनरल संजीव लंगर (रिटायर्ड) और पूर्व रॉ प्रमुख केसी वर्मा और दुलत इस बात पर एकमत थे कि खुफिया सूचनाओं को अधिक समय तक लटकाए नहीं रखा जा सकता, उन पर तुरंत सूझबूझ भरी कार्रवाई होनी चाहिए। लेफ्टिनेंट जनरल लंगर का कहना था, जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व में रोज होने वाले ऑपरेशन महज 30 पर्सेंट खुफिया जानकारी पर आधारित होते हैं। कोई भी पूरी खुफिया जानकारी आने तक इंतजार नहीं कर सकता। बड़े स्तर पर खुफिया जानकारियां सरकार को नीतिगत विकल्प मुहैया कराती हैं।

गुप्तचर एजेंसियों को एक ही व्यक्ति के अधीन रखना आत्मघाती
लेफ्टिनेंट जनरल डावर का कहना था कि जब तक तीनों सेनाओं की एकीकृत इंटेलिजेंस कमांड गठित नहीं हो जाती, खुफिया एजेंसियां आलोचना का शिकार होती रहेंगी। उन्होंने कहा, हर नाकामी के लिए खुफिया तंत्र को दोषी ठहराना बहुत आसान है, जबकि यह व्यवस्था की असफलता है। वहीं लेफ्टिनेंट जनरल लंगर बोले, भारतीय व्यवस्था में, सभी गुप्तचर एजेंसियों को एक ही व्यक्ति के अधीन रखना आत्मघाती होगा। उनका संकेत इस बात की ओर था कि ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पद पर आसीन व्यक्ति की खुफिया तानाशाही स्थापित हो जाएगी।

वार्ता का संचालन करने वाले केसी वर्मा का कहना था कि गुप्तचरों के लिए बड़ा निराशाजनक होता है जब हर दोष उन पर मढ़ दिया जाता है। वह बोले, उपलब्ध खुफिया जानकारी पर सही फैसला लेना एक कला है जो सभी को नहीं आती। केवल खुफिया जानकारी होने से ही युद्ध नहीं टाले जा सकते।

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